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: सुनिश्चित करे सरकार,सुप्रीम सरकार के आगे दम न तोड़े मूल अधिकार

जल बनाम जीवन : तालाब बनाम गरीब

सुनिश्चित करे सरकार, सुप्रीम आदेश के आगे दम न तोड़ें मूल अधिकार-

प्रयागराज - (संजय शेखर)....  पट्टा यदि दे भी दिया जाए तो मकान का क्या? इन परिवारों ने यहां मकान तो सरकारी योजनाओं के तहत बनाए थे, तब वह अवैध कैसे हो सकते हैं? यानी इन परिवारों की संपत्ति हुए। ऐसे में बिना मुआवजा दिए या मकान के बदले मकान दिए इनकी संपत्ति को इनसे छीनकर नष्ट कैसे किया जा सकता है। भले ही तालाब भूमि की मुक्ति के लिए सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है, किंतु यह आदेश नागरिक को प्राप्त संपत्ति और जीवन के मूल अधिकार का अतिक्रमण किसी सूरत में नहीं कर सकता है। अतः यह सरकारों का दायित्व है कि तालाब पर दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पालन की प्रक्रिया में नागरिक के मूल अधिकारों का दमन न होने पाए। साथ ही इस ओर मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देते हुए कार्रवाई की जाए। यदि मकान सरकारी आवास योजनान्तर्गत बने हैं, तब इसे अवैध या अतिक्रमण नहीं ठहराया जा सकता है। क्योंकि मकान सरकार ने बनवाए। अब यदि यह तालाब भूमि पर बने हैं तो इसकी जिम्मेदार भी सरकार है। ऐसे में गरीब परिवारों को बेघर कर उनके जीवन को संकट में डालना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है। जल ही जीवन है और इसलिए तालाब भी आवश्यक हैं, किंतु यह उन गरीब परिवारों की बर्बादी की कीमत पर कतई फायदे का सौदा नहीं, जिनके के लिए यह मौत का सबब बना दिया जाए। केवल पट्टा देकर पीछा छुड़ा लेने भर से काम नहीं चलेगा। यह तो सरासर अन्याय होगा। सरकार को सुव्यवस्थित विस्थापन करने और इन पिछड़े निर्धन परिवारों के समुचित पुनर्वास को प्राथमिकता में रख तालाब भूमि को मुक्त कराने की प्रक्रिया अमल में लानी चाहिए। किंतु ऐसा नहीं हो रहा है। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय का आदेश महज कागजी आदेश बनकर रह गया है। तालाब भूमि मुक्त हो और वहां समृद्ध सरोवर आकार ले, किंतु समुचित पुनर्वास की शर्त पर ऐसा हो। ताकि पिछड़े निर्धन परिवारों को और भी पीछे न धकेला जा सके। अनियोजित विस्थापन से और महज बेघर कर दिए जाने से इनकी पूरी पीढ़ी और आगामी पीढ़ियां कई कदम पिछड़ जाएंगी। अतः इन्हें और निर्धन न बनाया जाए इसका सरकार और न्यायालयों को भरपूर ध्यान रखना चाहिए। निर्धनों को 'मकान के बदले मकान' देकर और केवल इसी आधार पर विस्थापित और पुनर्वासित कराया जाना न्यायसंगत होगा। [caption id="attachment_2410" align="aligncenter" width="300"] समहन में स्कूल व बस्ती बसी हुई है (फ़ोटो)[/caption] प्रयागराज के मेजा तहसील अंतर्गत समहन गाँव मे इसी तरह का मामला प्रकाश में आया है,जहां अनुसूचित जाति के लगभग 75 परिवार आज इसी प्रशासनिक उदासीनता का दंश झेलने को मजबूर व पीडित हैं। दरअसल,सर्वोच्च न्यायालय ने तालाबों के संरक्षण को लेकर जल है जीवन की प्राथमिकता को तय करने की नियति से तालाबो को कब्जा मुक्त रखने और तालाबों को पुनर्जीवित कर उसका संरक्षण करने का आदेश पूर्व में पारित किया था। लेकिन जमीनी सच्चाई,कागजो पर लिखी इबारत से कहीं उलट है।अनुसूचित जाति के 75 परिवार 70 सालों से हैं आबाद- समहन में अनुसूचित जाति के लगभग 75 परिवार अपने मूल अधिकारों के हनन को लेकर परेशान हैं। 2015 के हाईकोर्ट इलाहाबाद के एक आदेश के बाद यह मामला प्रकाश में आया कि 1359 फसली में लगभग 15 बीघे का रकबा था जो कि अब अतिक्रमित हो गया है। हालांकि अतिक्रमण शब्द यहां कहना उचित नही होगा,क्योंकि उस जगह सरकारी सुविधाएं देकर उसे अंबेडकर नगर का दर्जा दे दिया गया है। सन 2007 में उक्त जगह को अम्बेडकर नगर घोषित कर इंदिरा आवास,सड़क,पेयजल की व्यवस्था,बिजली ,विद्यालय सभी सुविधा मुहैया की गई है।उक्त भूखण्ड में लगभग 75 परिवार लगभग 70 सालों से रह रहे हैं।यह भूखण्ड सन 1965 में जूनियर हाईस्कूल समहन के नाम कर दिया गया था और इसी समय 4 अन्य लोगों को भी पट्टा आबंटन किया गया था और सन 2010-11 में इसी में से 2 हेक्टेयर जमीन राजकीय मॉडल विद्यालय समहन के नाम आरक्षित किया गया। 2015 में जब इस संबन्ध में कोर्ट का एक फैसला आया तब जूनियर हाईस्कूल,मॉडल राजकीय विद्यालय एवं उल्लेखित 3 पट्टाधारको का नाम उक्त भूमि से खारिज कर वह जमीन तालाब के नाम कर दी गई। उसके बाद धारा67 के तहत कार्यवाही सुनिश्चित की गई। उक्त प्रकरण में यह तो बिल्कुल साफ हो गया कि भूखण्ड को तालाब बनाया गया 2011 में और कार्यवाही सुनिश्चित करने का आदेश आया 2015 मे। 2015 के आदेश के बाद भी आज तक कार्यवही नही की जा सकी। इस बस्ती के लोग अब दहशत में जी रहे हैं। समहन गाँव के लगभग 90 वर्ष के बुजुर्ग भगवत प्रसाद बताते हैं कि वे जब 13 साल के थे (सन 1951 में) तब से इसी जगह में रह रहे हैं। तब यह जगह सुनसान एक भट्टा नुमा गड्ढा था जहां गाँव का पानी व कूड़ा करकट आकर इकट्ठा होता था। भगवत प्रसाद का कहना है कि मूल गाँव समहन मे उनके पूर्वज रहते थे जो घनी आबादी थी,जगह कम होने की वजह से इसी जगह उस समय के लोगों ने यहां बसाया और यहीं रहने की जगह दी,उनके मना करने पर की कठौली गाँव के लोग परेशान कर सकते हैं,लेकिन तत्कालीन बड़े बुजुर्गों के किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं होगी के आश्वासन पर वहां रहना शुरू किया। उस वक्त एक दो परिवार ही इस जगह पर बसे लेकिन आज एक भरी पूरी बस्ती बस गई है। https://youtu.be/bGBBmjEfNAo इस जगह पर दो बड़े स्कूल भी स्थापित हैं जो सरकारी व अनुदानित हैं। इस बस्ती को अंबेडकर गाँव का दर्जा देकर शौचालय,सड़क,बिजली, सरकारी आवास आदि की सुविधा भी प्राप्त है। यहां पर प्रशासन तोड़फोड़ की कार्रवाई करने आमादा है,यह बताकर कि उक्त बस्ती तालाब पर बसी है,जो अवैध है। यहां अब यह सवाल खड़ा होना लाजमी हो जाता है कि,जब यह तालाब था तो सरकारी विद्यालय,सरकारी आवास,शौचालय,सड़क आदि कैसे बन गए?
  • बस्ती के लोगों का प्रशासन से सवाल -जब यहां के अनुसूचित जाति के लोग अतिक्रमण कर रह रहे थे तो उन्हें इंदिरा आवास,शौचालय कैसे स्वीकृत हुआ? कालोनी या सरकारी आवास तो उन्हें मिलता है जिनके पास घर बनाने की जमीन हो पट्टा हो,बिना जाँच परख कर उन्हें सरकारी सुविधा मुहैया कैसे कराई गई ?उन्हें इंदिरा आवास या पीएम आवास का लाभ कैसे मिला? यह तमाम सवाल जमीनी हकीकत एवं प्रशासन की घोर लापरवाही को दर्शाते हैं। एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय जल संरक्षण को लेकर तालाबों के पुनरुद्धार को लेकर बसाहटों को हटाने का निर्देश देता है,वहीं दूसरी ओर कच्चे मकान से पक्का मकान निर्माण कराने में जुटे प्रशासनिक अधिकारियों को योजनाओं के लक्ष्य पूर्ति की जल्दबाजी में न तो तालाब दिखता है और न ही आवास योजना का निर्धारित मानक ,तभी तो समहन में तालाब के भूखण्ड में इंदिरा आवास,पीएम आवास व सड़क,पेयजल नलकूप आदि की सरकारी व्यवस्था कर दी गई। पहले सरकारी राशि से निर्माण हुआ और अब उसी सरकारी आवास को तोड़ने सरकारी कर्मचारी आमादा हैं ?
  • बस्ती के भगवान प्रसाद व 90 वर्षीय बुजुर्ग भगवत प्रसाद बताते हैं कि उक्त भूखण्ड पहले एक भट्ठा था जहां हम लोगों को गाँव के कुछ जमीदारों ने बसाया था। तब कोई तालाब नही था,अब तालाब कैसे हो गया। भगवत प्रसाद यह भी कहते हैं कि सन 1951 में जब वे 13 साल के थे तब से यहां रह रहे हैं अब वे 90 वर्ष के पार हैं। आज जो अधिकारी तोडने की धमकी दे रहे हैं ,तब ये अधिकारी कहाँ थे,जब इसी जगह सरकारी कालोनियां बन रही थीं,सरकारी विद्यालय बन रहा था,अंबेडकर नगर घोषित हो रहा था,तब ये अधिकारी व कोर्ट कहाँ था। अपनी आंखों में व्यथा व दर्द समेटे भुअरी देवी का कहना है कि हम लोग गरीब हैं,हमारे पास कोई जमीन नही है।
[caption id="attachment_2399" align="aligncenter" width="300"] समहन के ग्रामीण आंखों में दहशत व उम्मीद दोनों है।[/caption] हम आखिर अब कहाँ जाएंगे,पूरा जीवन यहीं बिता दिया तब तक कोई नही हटाने आया,अब हमारे साथ छल किया जा रहा,यह पूछने पर की अधिकारी तो पट्टा कर दिए जाने की बात कह रहे हैं। इस पर वह अनभिज्ञता जताते हुए कहती हैं कि हमे तो नही पता,यही कई ग्रामीण कहते नजर आए की पट्टा अभी नही मिला है . https://youtu.be/RaJnuO114ik हमे पट्टा के साथ मकान के बदले मकान बनाकर दे सरकार तब यहां से विस्थापन कराये,हमें यही हवा,यही पेड़ पौधे और इसी तरह का मकान व माहौल यदि सरकार या कोर्ट दे सकती है तो हम यहाँ से हट सकते हैं,और अन्यत्र बस सकते हैं।    

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