चिंतन - संघ मुख्यालय पर पढ़ी गई नमाज : समाज संघमय या संघ समाजमय ? संघ के पदाधिकारियों में विचारों का विरोधाभास?
Tue, Feb 17, 2026
अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश)-
पते की बात :
संघ मुख्यालय पर नमाज -
स्वयंसेवकों में बेचैनी
अभी कुछ दिन पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक वरिष्ठ पूर्व प्रचारक का फोन मेरे पास आया, उनके मेरे अत्यंत आत्मीय संबंध हैं, हमने उनके मार्गदर्शन में बहुत सारा काम किया - राष्ट्र और समाज का। उन्होंने भी अन्य प्रचारकों की तरह सारा जीवन लगा दिया, संघ की ध्येय पूर्ति के लिए।
मुझे बातचीत में थोड़े व्यथित लगे, मेरे पूंछने पर उन्होंने वापस मुझसे जानना चाहा कि आपको नहीं पता क्या कि संघ मुख्यालय में नमाज हो गई। मेरे इंकार पर उन्होंने बताया एक बार नहीं पांच बार, तीन बार रेशम बाग संघ मुख्यालय में और दो बार डॉ हेडगेवार भवन में।
मैंने उनसे कहा कि मुझे जानकारी नहीं है, जानकारी करूंगा। तब उन्हें कहा - अरे ! सारे देश में कांग्रेसी इस पर चर्चा कर रहें हैं। तुम इस पर लिखो। तब मैंने कहा बिना प्रमाण मैं नहीं लिखूंगा, कोशिश करता हूं, स्पष्ट प्रमाण मिले।
वह बहुत व्यथित थे, उन्होंने कहा कि डॉ साहब को मात्र 15 वर्ष मिले संघ को खड़ा करने के लिए,
डॉ साहब, समाज को संघमय बनाना चाहते थे, भागवत जी ने संघ को ही समाजमय बना दिया।
उन्होंने बहुत सारी अन्य बातें भी कहीं, जिनकी चर्चा में मैं यहां नहीं कर रहा हूँ।
आज प्रातः भ्रमण के दौरान एक यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो मिला, जो इस घटना की पुष्टी करता है।
घटना की जानकारी इस प्रकार हैं, जो मौलाना आजाद विश्वविद्यालयके वाइसचांसलर जफर सरेशवाला ने बताई है -
"2017 में नागपुर के रेशमबाग आरएसएस का एक कार्यक्रम था जो सेना के लोगों के लिए आयोजित किया गया था तब मोहन भागवत साहब के भाई मुझे निमंत्रण देने आएं थे, मैंने एक शर्त रखी कि मैं आऊंगा लेकिन तभी जब मुझे भागवत साहब के साथ 45 मिनट अकेले में बात कर इनका मौका मिलें।"
"दो दिन बाद उनके भाई ने कहा कि आपकी शर्त मंजूर है तो मैं वहां गया रात को मुझे नागपुर में ही रुकना था, मैंने कहा कि मैं कहीं भी रुक जाऊंगा। तो उन्होंनेकहा नहीं हमने आपके रुकने का इंतजाम 'हेडगेवार भवन' में ही किया है।"
"मैं वहाँ गया, उन्होंने मुझे खाना खिलाया। फिर मेरी नमाज का वक्त हो गया था, मगरिब और ईशा की नमाज का , मैंने उनसे कहा - "भाई, मुझे बाहर कोई मस्जिद दिखा दिल तो मैं जाकर नमाज पढ़ लूं, तब भागवत साहब के भाई और वहाँ मौजूद एक अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा - नहीं - नहीं जफर भाई, आप यहीं नमाज पढ़ सकते हैं, मैने पूंछा - क्या वाकई मैं यहां पढ़ सकता हूं ?"
"उन्होंने कहा - हाँ, उन्होंने वहाँ एक सफेद कपड़ा बिछाया, और मुझे बताया कि पश्चिम दिशा ( किबला) इस तरफ है। आप बिल्कुल यहाँ नमाज पढ़ सकते हैं।उन्होंने मुझे सुबह की नमाज का वक्त भी बताया मैंने वहां मगरिब ईशा और फ़ज़र की नमाज भी पढ़ी।"
ज़फ़र सरेशवाला एक व्यवसायी है और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलाधिपति हैं। वह तबलीगी जमात के सदस्य और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी समर्थक और विश्वासपात्र माना जाता है। प्रश्न यह है कि इसने आठ वर्ष इस घटना की चर्चा क्यों की ?
• किसी भी हिंदू को किसी की धार्मिक क्रियाओं पर कोई आपत्ति कभी नहीं है किंतु जब हम अपनी आस्था और पूज पद्धति के कारण वाजिब-उल-क़त्ल हैं तो यह प्रेम की पीगें क्यों ?
• जब हम जानते हैं कि हर एक मुसलमान अपने इस्लामिक एजेंडे पर कायम है और वह कुरान के खिलाफ नहीं जा सकता तो यह प्रेम की पीगें क्यों ?
• जब हम इतिहास की घटनाओं से लेकर वर्तमान तक इस्लामिक जिहादियों के मंसूबे जानते हैं, तो यह प्रेम की पीगें क्यों ?
• जब हम जानते हैं कि कोई भी मुसलमान कयामत के लिए समर्पित है जो तब ही होगी जब सारी दुनिया में इस्लाम का शासन होगा तो यह प्रेम की पीगें क्यों ?
• जब इस्लाम की निगाह में मुश्रिक है काफ़िर है और इस नाते वाजिब-उल-क़त्ल हैं तो यह प्रेम की पीगें क्यों ?
• क्या संघ के द्वारा दशकों से जो भाईचारा मुसलमानों से बनाया जा रहा है, उससे हिंदुओं उत्सवों जुलूसों पर हमले बंद हो गए ?
• क्या निर्दोष हिंदुओं के कत्ल में कमी आ गई ?
• क्या लव जिहाद में हमारी बहनों बेटियों के कत्ल रुक गए ?
• क्या हिंदू मंदिरों पर बनी मस्जिदें हट गई ?
• क्या सरकारी जमीनों पर नाजायज कब्जे समाप्त हो गए ?
• क्या मुसलमानों ने अपनी धर्मांतरण की कार्यवाहियां बंद कर दी ?
• क्या इस्लामिक जिहादी संगठनों ने गज़वा ए हिंद की अपनी कौल वापस ले ली ?
• क्या पश्चिमी बंगाल में तृणमूल कांग्रेस द्वारा कत्ल किए गए हिंदुओं का बदला ले लिया गया?
मैं स्वयं एक स्वयंसेवक के रूप में काम करता हूं और संघ के मूल दर्शन पर मेरी अगाध आस्था है मैं यह मानता हूं कि संघ के सुदृढ़ीकरण के बिना भारत में सनातन संस्कृति के भविष्य को अक्षुण्ण नहीं रखा जा सकता किंतु इसके लिए एक साहसिक नेतृत्व और सशक्त समाज की आवश्यकता है जो संघ का वर्तमान नेतृत्व नहीं दे सका और देश के राष्ट्रवादी इस अचेतनता में रहें कि भाजपा शासन को संघ नियंत्रित करता है अब ठीक ही होगा, और हमारी छाती पर यूजीसी के समाज विध्वंसक नियम लाद दिए गए।
अनेक वर्षों से संघ प्रमुख मोहन भागवत जी के अलबेले बयान आ रहे थे, संघ के स्वयंसेवक हतप्रभ थे जैसे उन्होंने कहा -
• मुसलमानों को पराया ना समझें वह हमसे अलग नहीं है
• जातियां भगवान ने नहीं बनाई हैं, यह तो पंडितों ने बनाई हैं। इससे पूर्व संघ प्रमुख का मज़ार पर जाकर चादर चढ़ाई (जब की मज़ारों को स्वयं इस्लाम मान्यता नहीं देता)
• उन्होंने कहा कि हमारा 'डीएनए एक है,
• प्रत्येक मस्जिदों के नीचे शिवलिंग नहीं खोजने चाहिए'.
• 'राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग बंद कर देना चाहिए',
• 'कुछ दिन मूर्तियों की पूजा से परहेज करना चाहिए', आदि आदि।'
हो सकता है कि मेरे मानस में उठ रहे प्रश्न सतही या निरर्थक हों, किंतु एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने प्रचारक जीवन जिया, उसकी वेदना को तो नहीं नकारा जा सकता।
संघ का वर्तमान नेतृत्व ना तो विद्यमान चुनौतियों के अनुरूप अपनी प्रतिकार क्षमता को विकसित कर पाया, ना समाज में उस इस्लामिक जिहाद से प्रतिकार शक्ति को दिशा दे पाया, ले दे कर समाज में यह संदेश प्रसारित हो गया कि केंद्र तथा कुछ राज्यों में भाजपा की सत्ता को ही वह अंतिम लक्ष्य प्राप्ति मान लें।
और परिणाम यूजीसी के नए नियमों, अल्पसंख्यक मंत्रालय को 3400 करोड़ रुपए, पिछड़ा आरक्षण में पिछले दरवाजे से संविधान विरुद्ध आरक्षण मुसलमानों को दिया जा रहा है। हमारे पैसे से चलने वाले विश्वविद्यालों में हिंदू विरोधी राष्ट्रविरोधी गतिविधियां चल रही है।
तो स्थिति का आंकलन करिए और अपने अंदर संघर्ष का संकल्प विकसित करिए।
(उपरोक्त संकलन अशोक चौधरी जी के फेसबुक वॉल से लिया गया है। अशोक चौधरी जी संघ विचारधारा से जुड़े हैं और आहुति नामक एक सामाजिक संगठन का संचालन भी करते हैं और अच्छा लिखते भी हैं)
साभार-
~ अशोक चौधरी
अध्यक्ष - आहुति अलीगढ़
समन्वय- : धर्म सत्ता के साये में बढ़ती है राजसत्ता,गोमाता ही है सनातन का स्वाभिमान
Sat, Feb 7, 2026
संपादक की कलम से -
प्रमुख बिंदु
- समन्वयता से ही होगा विकास,हठ सिवाय हाथ मलने के कुछ भी नहीं..
गो प्रतिष्ठा ही सनातन स्वाभिमान का संकल्प" -
राज्यसत्ता और धर्मसत्ता का समन्वय कर सकता है अखंड सनातनी राष्ट्र का निर्माण -
लखनऊ- समन्वयता ही शक्ति का आधार -
भारत भूमि सदैव से ही सनातनी परंपरा की संवाहक रही है। इस भूमि में गुरुओं का बड़ा आदर सम्मान रहा तथा राजसत्ता का धर्म सत्ता मार्गदर्शन करती रही है।
गौ माता का आदर भारत भूमि का आभूषण रहा है और हर सनातनी की आस्था और सभ्यता का केंद्रबिंदु भी। प्रत्येक सनातनी अपने चूल्हे की पहली रोटी गौ माता के लिए निकालता है,यह परंपरा आज की नहीं बल्कि वर्षों पुरानी सभ्यता का प्रतीक है। सनातनी चौखट की रक्षाकवच रहीं हैं गौ माता और परिवार समाज व राष्ट्र की समृद्धिकारक धरोहर भी। सतयुग,त्रेता व द्वापर में भी गौ माता का बड़ा सम्मान रहा। ईश्वरी सत्ताओं के अवतरण का मूल भी इन्ही गौ माता को माना जाता है।
भगवान श्री कृष्ण बिन पनही के गौ चारण किया और गोपाल - ग्वाल व गोबिंद कहलाये। पूर्व में राजाओं के द्वारा गोदान व गो रक्षा का प्रकल्प बड़ी मात्रा में देखा गया।
स्वाभिमान की प्रतीक गो माता की रक्षार्थ युद्ध भी हुए और जीत भी ।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कलयुग के इस दौर में " गोदान" की जगह "गो-बध"को प्रश्रय दिया जा रहा है। पूर्वकाल में राजाओं द्वारा गो रक्षा की जाती रही पूजन किया जाता रहा और दान दिया जाता रहा लेकिन आज लोकतंत्रात्मक शासन काल में गो बध को बढ़ावा दिया जा रहा है। और जब इसका विरोध धर्म गुरु करते हैं तो उन पर राजसत्ता चढ़ाई कर उन्हें मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनाती है और लांक्षित करती है।
गो माता की हो रही हत्या का पाप जाने अनजाने में सभी सनातनियों पर लगा रहा है। क्योंकि राजा के कर्म की सजा कहीं न कहीं प्रजा को भी भुगतनी पड़ती है।
इसलिए,धर्म के धर्माचार्य अपनी सनातनी जनता को गो हत्या के पाप से मुक्त करने के लिए आगे आये हैं। क्योंकि पाप श्राप से बचाने का कार्य गुरु ने ही किया है यह शास्त्र व इतिहास दोनों बताते हैं।
राजसत्ता को धर्म का प्रतिपालक समझ लेना ही कहीं न कहीं बड़े नुकसान का कारण होता है। राजसत्ता कार्य व व्यवस्था का संचालन करती है परंतु धर्मसत्ता जो राजसत्ता के कार्य का निरूपण करती है उसकी समीक्षा कर उसे धर्मनीतिगत बनाती है ताकि किसी भी प्रजा को या राज्य की जनता व राजा से कोई भी पाप न हो ।
लेकिन,आज राजसत्ता की अकड़ व वहम् इतना अहम होते जा रहा है कि गुरु से ही विद्रोह करने में जुटा हुआ है। यह बिल्कुल अधर्म है और अनीति भी है ।
आवश्यकता है धर्मनीति की स्थापना की
जब जब धर्म पर राजनीति हावी होने की कोशिश की है तब तब समाज का राष्ट्र का पतन हुआ है। राजसत्ता पर हमेशा ही धर्मसत्ता का बुलडोजर चला है तभी राजसत्ता व धर्म सत्ता दोनों सुरक्षित रही हैं। यदि राजनीति का बुलडोजर धर्म नीति पर चलेगा तो राष्ट्र की अखंडता धूमिल होगी और खंडित होगी। इसलिए राजसत्ता पर धर्म सत्ता का नकेल होना अत्यंत आवश्यक है।
आज सनातन धर्म की सत्ता पर जो 4 धर्माधीश बैठे हैं सही मायने में वही धर्म व राष्ट्र के आचरण हैं। क्योंकि यही वह पुरातन सभ्यता के प्रतीक हैं जिसकी नींव सनातन के पुनर्स्थापना की रही है।
सनातन के पुनर्स्थापक हैं पूज्य शंकराचार्य-
हजारों वर्षों के त्याग,बलिदान,तप,जप और यज्ञ संकल्प के प्रतीक हैं हमारे सनातन के धर्माचार्य जिन्हें शंकराचार्य कहते हैं। सनातन धर्म के पुर्नस्थापक हैं आदि गुरु शंकराचार्य जी,जो लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व सैकड़ों धर्म विरोधियों से शास्त्रार्थ करके उन्हें हराकर सनातन को पुनरुत्थान व प्रतिष्ठापित किया। उसी परंपरा के संवाहक हैं हमारे बीच शंकराचार्य जी। हमारे पुरखों ने इनके द्वारा दिखाए रास्ते पर चले और वही सत्मार्ग हमारे पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है। वही अनुशासन हमारी प्रेरणा है जिसे शंकराचार्य जी के द्वारा प्रतिपादित किया गया। हमारे पूर्वज उसी को मान कर अपने धर्म का पालन करते आये हैं।
आजकल के मोबाइली ज्ञान से है खतरा
पीढ़ीगत व परंम्परागत ढंग से धर्म
शास्त्र,नीति व आचरण का पालन करके हमारे पूर्वजों ने जो धाती बचाई उसे आज खंडित करने के लिए मोबाइली समाज मुंह बाए खड़ा है। इससे हमारे पूर्वजों का मान सम्मान,हमारी धर्मीक विरासत और हमारे संस्कारों को खतरा पैदा हो गया है,इससे बचना होगा। मोबाइल में एक ऐसा धड़ा धर्म की धज्जियां उड़ा रहा है जो पश्चिमी देशो के विधर्म पर पल रहा है। उसी पर परोसा गया अज्ञान व भ्रामक प्रपंच को अपना ज्ञान समझता है आज का युवा । पहले घरों में रामायण,गीता,नीति शास्त्र का वाचन होता था,गुरु परंपरा थी तो घर मे सामूहिक अनुष्ठान होते थे और घर के सभी बुजुर्ग,बच्चे,महिलाएं उस आध्यत्मिक सकारात्मक वातावरण में संस्कारित होती थीं,लेकिन आजकल परिवार एकाकी जीवन जीने की राह पर है जो कि विखंडित हो रहा है। मोबाइल में प्रसारित हो रहे अधकचरी बातों को फिल्टर करने का कोई छन्नी तो लगी नही है जो अच्छी और सत्य बातों को ही उसमें आगे करे। आवश्यकता है किताबों व बुजुर्गों के मार्गदर्शन की न कि मोबाइल के ज्ञान की।
धर्मसत्ता की छांव में राजसत्ता पलती है तो राज्य सुखी रहता है-
राजसत्ता के आगे गुरुओं व सन्यासियों का सत्य कभी नही झुका और जहां झुका भी वहां समाज व धर्म का पतन हुआ है ।
जब चाणक्य जो कि धर्म के शिक्षक व आचार्य थे,जब उनको राजसत्ता ने दबाना चाहा,उनका जब मजाक उड़ाया,अपमान किया तो राजसत्ता का ऐसा हश्र हुआ कि न तो व राजा बचा और न ही उसका राज।
आचार्य ने नए शासक व सत्ता का सृजन कर वैश्विक इतिहास रचा। इसलिए राजसत्ता को हमेशा परंम्परागत अधिकार प्राप्त अपने शंकराचार्य का सम्मान कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। क्योंकि धर्मसत्ता की छांव में ही राजसत्ता बढ़ती है पलती है और सुखी होती है। जब धर्मसत्ता का आशीर्वाद व संरक्षण राजसत्ता पर रहेगा तो अवश्य ही राजा प्रतापी बनेगा और उसकी कीर्ति धूमिल नही होगी।
गो माता का सम्मान राज्य के शिखर का सम्मान है,जो राजा के आचरण व संस्कार का बोध कराता है ।
गुरू हमेशा अपने राज्य की सत्ता का भला ही चाहता है,शब्द कठोर हो सकते हैं लेकिन गुरू का हृदय हमेशा ही कोमल होता है।
वस्तुतः यही स्थिति उत्तरप्रदेश के राजा ( लोकतांत्रिक समाज में मुख्यमंत्री) की होनी चाहिए उनको भी अपने जगद्गुरु शंकराचार्य का आशीर्वाद मिलना चाहिए।
योगी आदित्यनाथ जी ( राजसत्ता) और शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ( धर्मसत्ता ) का समन्वय निश्चित रूप से भारत को नए अभ्युदय की ओर ले जाएगा और अखंड सनातनी राष्ट्र बनाने की ओर उन्मुख करेगा।
राज्य सत्ता को बस चाहिए कि धर्म सत्ता के मान बिंदुओं का मान रखे,गो माता को राज्य माता का सम्मान व प्रतिष्ठा प्रतिष्ठित करे ।
यही दीर्घकालिक अलंकरण की विधा है। इसका स्वागत राज्य ही नही बल्कि राष्ट्र का हर सनातनी करेगा ।