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झाड़ू छोड़ आये कमल के फूल के लिए,तो क्या होगा "आप"का

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Breaking - political talk : जीत के हीरो : झाड़ू छोड़ आये कमल के फूल के लिए,तो क्या होगा "आप"का

दिल्ली - राजनीति का कोई एक धर्म नही होता,समयानुसार बदलता रहता है। कभी आओ आदमी पार्टी के "जीत का हीरो" कहे जाने वाले संदीप पाठक ने टोली बदल ली और झाड़ू को छोड़कर कमल के फूल को पसंद कर लिया। जो कभी फूल के मुरझाने की प्रतीक्षा में थे आज वह उसी कमल को भरपूर पानी देने की लाइन में लग गए। यही राजनीति की परिभाषा है।

मौका देख चौका लगाने का जुगाड़ ही असली राजनीतिज्ञ होने की सफल परिभाषा बन गई है। आम आदमी पार्टी के रणनीतिकार संदीप पाठक मूल रूप से छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। ये आप के भरोसेमंद सिपाही रहे हैं जिन्होंने पार्टी को पंजाब जैसे राज्य में सत्ता दिलाई। लेकिन राजनीति में जीत के बादशाह को अब पार्टी में ही जब मात मिलने लगी तो उन्होंने पाला बदल लिया।

हालांकि, राघव चड्डा जो कि राज्य सभा सांसद भी हैं जो आम आदमी पार्टी के तेज तर्रार नेता हैं उन्होंने भी पाला बदल लिया है। इन दिनों चर्चा का बाजार गर्म रहा राघव चड्डा को लेकर,लेकिन हैरानी तब हुई जब एक साथ कई नेताओं ने आम आदमी पार्टी को ठेंगा दिखाकर बीजेपी की ओर रुख कर दिए।

लेकिन,इनमें से सबसे महत्वपूर्ण हीरो रहे संदीप पाठक जो कि पार्टी के कुशल रणनीतिकार माने जाते थे उन्होंने जब बगावत कर दिन रात गाली देने वाली पार्टी में शामिल हुए तो कई राजनीतिक महारथियों ने हाथों तले उंगली दबाए नजर आए की बीजेपी के चाणक्य ने सबको हरा दिया । क्योंकि,बीजेपी के रणनीतिकार ने आम आदमी पार्टी के कुशल चाणक्य को पटखनी दे दी ।

अरविंद केजरीवाल का थिंक टैंक अब बीजेपी के साथ हो गया। इससे "आप" को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है,जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार को होगा। एक साथ 7 बड़े नेताओं का पार्टी से अलग होना बहुत बड़े नुकसान को दर्शाता है।

आखिर क्यों आई ऐसी नौबत - जब व्यक्ति या संगठन में अहंकार के बीज पनपने लगते हैं तो विनाश निश्चित हो जाता है,चाहे वह समाज हो या फिर राजनीति । आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल का अहंकार कई धरातलीय साथियों के मन को तोड़ दिया। यही कारण है कि मजबूत असरकारी नेताओं ने दूसरी पार्टी जॉइन कर ली। बताया जा रहा है कि यह विसात, दिल्ली चुनाव में मिली हार से ही बिछाई गई थी और बगावत की सुगबुगाहट यहीं से पनपने लगी थी। जिस राघव चड्डा ने अपने बेखौफ अंदाज से जनता का दिल जीतने में लगे थे तो वहीं उनकी लोकप्रियता से पार्टी शीर्ष को घबराहट होने लगी थी। और यही हाल संदीप पाठक का भी रहा,जब दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा तब पूरा ठीकरा संदीप पाठक पर मढ़ा गया,तभी से पाठक ने पार्टी से किनारा करना शुरू कर दिया था। 2022 कि चुनाव में पंजाब की सरकार के बेताज बादशाह बने संदीप पाठक जिन्हें जीत का हीरो कहा गया था,उनको हार की वजह करार दिया गया। मतलब, जब सत्ता मिली तो थिंक टैंक के चाणक्य और जब पार्टी सत्ता नही पा सकी तो विलन ! यही मनमुटाव बीजेपी के लिए ढाल बन गई और आज आम आदमी पार्टी की झाड़ू ढीली पड़ गई और कमल को तालाब लबालब होने लगा।

तो पार्टी को होगा भारी नुकसान - राजनीति के जानकार बताते हैं कि जिस गति और विश्वास के साथ आम आदमी पार्टी ने अपना रुतबा देश की राजनीति में मजबूत विकल्प के रूप में बनाया था वह अब कमजोर दिखता पड़ रहा है। एक साथ कई विधायकों व राज्य सभा सांसदों का टूटना निश्चित रुप से "आप" के घर को कमजोर बना दिया है। अरविंद केजरीवाल राजनीति के हाशिये पर दिखाई देने लगे हैं। हालांकि,सोशल मीडिया पर इन टूटे हुए सितारों की किरकिरी भी हो रही है,यह कमेंट पढ़ने को मिल रहे हैं कि जिस पार्टी ने इन नेताओं को कैरियर व ऊंचाई दी आज उसी को छोड़कर पाला बदल लेना कायराना हरकत का प्रदर्शन है। कुछ लोग तो इसे डर का परिणाम बता रहे हैं,कुछ ईडी के छापे का डर और कुछ बीजेपी की सत्ता का रौब भी ! वजह कुछ भी हो लेकिन नुकसान तो आम आदमी पार्टी का ही होना दिखता है। हालांकि,अभी तो एक ट्रेलर है टूटने का तिलिस्म अभी बाकी है। कहा यह भी जा रहा है कि बीजेपी नेतृत्व की निगाहें आम आदमी पार्टी की तरफ है क्योंकि झाड़ू की जकड़ कमजोर हो चली है,सिंके ढीली पड़ गईं हैं झाड़ू तीतर बितर होने की कगार पर है। ऐसे में अरविंद केजरीवाल क्या रुख अपनाते हैं यह भविष्य की गर्भ में छिपी रणनीति का हिस्सा है। नितिन नवीन और बीजेपी के चाणक्य अमित शाह की निगाहें गड़ी हुई हैं,नजर लग गई है "आप" पर।

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