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चिंतन - संघ मुख्यालय पर पढ़ी गई नमाज : समाज संघमय या संघ समाजमय ? संघ के पदाधिकारियों में विचारों का विरोधाभास?

अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश)- पते की बात : संघ मुख्यालय पर नमाज - स्वयंसेवकों में बेचैनी

अभी कुछ दिन पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक वरिष्ठ पूर्व प्रचारक का फोन मेरे पास आया, उनके मेरे अत्यंत आत्मीय संबंध हैं, हमने उनके मार्गदर्शन में बहुत सारा काम किया - राष्ट्र और समाज का। उन्होंने भी अन्य प्रचारकों की तरह सारा जीवन लगा दिया, संघ की ध्येय पूर्ति के लिए।

मुझे बातचीत में थोड़े व्यथित लगे, मेरे पूंछने पर उन्होंने वापस मुझसे जानना चाहा कि आपको नहीं पता क्या कि संघ मुख्यालय में नमाज हो गई। मेरे इंकार पर उन्होंने बताया एक बार नहीं पांच बार, तीन बार रेशम बाग संघ मुख्यालय में और दो बार डॉ हेडगेवार भवन में।

मैंने उनसे कहा कि मुझे जानकारी नहीं है, जानकारी करूंगा। तब उन्हें कहा - अरे ! सारे देश में कांग्रेसी इस पर चर्चा कर रहें हैं। तुम इस पर लिखो। तब मैंने कहा बिना प्रमाण मैं नहीं लिखूंगा, कोशिश करता हूं, स्पष्ट प्रमाण मिले।

वह बहुत व्यथित थे, उन्होंने कहा कि डॉ साहब को मात्र 15 वर्ष मिले संघ को खड़ा करने के लिए, डॉ साहब, समाज को संघमय बनाना चाहते थे, भागवत जी ने संघ को ही समाजमय बना दिया। उन्होंने बहुत सारी अन्य बातें भी कहीं, जिनकी चर्चा में मैं यहां नहीं कर रहा हूँ।

आज प्रातः भ्रमण के दौरान एक यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो मिला, जो इस घटना की पुष्टी करता है। घटना की जानकारी इस प्रकार हैं, जो मौलाना आजाद विश्वविद्यालयके वाइसचांसलर जफर सरेशवाला ने बताई है -

"2017 में नागपुर के रेशमबाग आरएसएस का एक कार्यक्रम था जो सेना के लोगों के लिए आयोजित किया गया था तब मोहन भागवत साहब के भाई मुझे निमंत्रण देने आएं थे, मैंने एक शर्त रखी कि मैं आऊंगा लेकिन तभी जब मुझे भागवत साहब के साथ 45 मिनट अकेले में बात कर इनका मौका मिलें।"

"दो दिन बाद उनके भाई ने कहा कि आपकी शर्त मंजूर है तो मैं वहां गया रात को मुझे नागपुर में ही रुकना था, मैंने कहा कि मैं कहीं भी रुक जाऊंगा। तो उन्होंनेकहा नहीं हमने आपके रुकने का इंतजाम 'हेडगेवार भवन' में ही किया है।"

"मैं वहाँ गया, उन्होंने मुझे खाना खिलाया। फिर मेरी नमाज का वक्त हो गया था, मगरिब और ईशा की नमाज का , मैंने उनसे कहा - "भाई, मुझे बाहर कोई मस्जिद दिखा दिल तो मैं जाकर नमाज पढ़ लूं, तब भागवत साहब के भाई और वहाँ मौजूद एक अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा - नहीं - नहीं जफर भाई, आप यहीं नमाज पढ़ सकते हैं, मैने पूंछा - क्या वाकई मैं यहां पढ़ सकता हूं ?"

"उन्होंने कहा - हाँ, उन्होंने वहाँ एक सफेद कपड़ा बिछाया, और मुझे बताया कि पश्चिम दिशा ( किबला) इस तरफ है। आप बिल्कुल यहाँ नमाज पढ़ सकते हैं।उन्होंने मुझे सुबह की नमाज का वक्त भी बताया मैंने वहां मगरिब ईशा और फ़ज़र की नमाज भी पढ़ी।"

ज़फ़र सरेशवाला एक व्यवसायी है और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलाधिपति हैं। वह तबलीगी जमात के सदस्य और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी समर्थक और विश्वासपात्र माना जाता है। प्रश्न यह है कि इसने आठ वर्ष इस घटना की चर्चा क्यों की ?

• किसी भी हिंदू को किसी की धार्मिक क्रियाओं पर कोई आपत्ति कभी नहीं है किंतु जब हम अपनी आस्था और पूज पद्धति के कारण वाजिब-उल-क़त्ल हैं तो यह प्रेम की पीगें क्यों ?

• जब हम जानते हैं कि हर एक मुसलमान अपने इस्लामिक एजेंडे पर कायम है और वह कुरान के खिलाफ नहीं जा सकता तो यह प्रेम की पीगें क्यों ?

• जब हम इतिहास की घटनाओं से लेकर वर्तमान तक इस्लामिक जिहादियों के मंसूबे जानते हैं, तो यह प्रेम की पीगें क्यों ?

• जब हम जानते हैं कि कोई भी मुसलमान कयामत के लिए समर्पित है जो तब ही होगी जब सारी दुनिया में इस्लाम का शासन होगा तो यह प्रेम की पीगें क्यों ?

• जब इस्लाम की निगाह में मुश्रिक है काफ़िर है और इस नाते वाजिब-उल-क़त्ल हैं तो यह प्रेम की पीगें क्यों ?

• क्या संघ के द्वारा दशकों से जो भाईचारा मुसलमानों से बनाया जा रहा है, उससे हिंदुओं उत्सवों जुलूसों पर हमले बंद हो गए ?

• क्या निर्दोष हिंदुओं के कत्ल में कमी आ गई ?

• क्या लव जिहाद में हमारी बहनों बेटियों के कत्ल रुक गए ?

• क्या हिंदू मंदिरों पर बनी मस्जिदें हट गई ?

• क्या सरकारी जमीनों पर नाजायज कब्जे समाप्त हो गए ?

• क्या मुसलमानों ने अपनी धर्मांतरण की कार्यवाहियां बंद कर दी ?

• क्या इस्लामिक जिहादी संगठनों ने गज़वा ए हिंद की अपनी कौल वापस ले ली ?

• क्या पश्चिमी बंगाल में तृणमूल कांग्रेस द्वारा कत्ल किए गए हिंदुओं का बदला ले लिया गया?

मैं स्वयं एक स्वयंसेवक के रूप में काम करता हूं और संघ के मूल दर्शन पर मेरी अगाध आस्था है मैं यह मानता हूं कि संघ के सुदृढ़ीकरण के बिना भारत में सनातन संस्कृति के भविष्य को अक्षुण्ण नहीं रखा जा सकता किंतु इसके लिए एक साहसिक नेतृत्व और सशक्त समाज की आवश्यकता है जो संघ का वर्तमान नेतृत्व नहीं दे सका और देश के राष्ट्रवादी इस अचेतनता में रहें कि भाजपा शासन को संघ नियंत्रित करता है अब ठीक ही होगा, और हमारी छाती पर यूजीसी के समाज विध्वंसक नियम लाद दिए गए।

अनेक वर्षों से संघ प्रमुख मोहन भागवत जी के अलबेले बयान आ रहे थे, संघ के स्वयंसेवक हतप्रभ थे जैसे उन्होंने कहा -

• मुसलमानों को पराया ना समझें वह हमसे अलग नहीं है

• जातियां भगवान ने नहीं बनाई हैं, यह तो पंडितों ने बनाई हैं। इससे पूर्व संघ प्रमुख का मज़ार पर जाकर चादर चढ़ाई (जब की मज़ारों को स्वयं इस्लाम मान्यता नहीं देता)

• उन्होंने कहा कि हमारा 'डीएनए एक है,

• प्रत्येक मस्जिदों के नीचे शिवलिंग नहीं खोजने चाहिए'.

• 'राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग बंद कर देना चाहिए',

• 'कुछ दिन मूर्तियों की पूजा से परहेज करना चाहिए', आदि आदि।'

हो सकता है कि मेरे मानस में उठ रहे प्रश्न सतही या निरर्थक हों, किंतु एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने प्रचारक जीवन जिया, उसकी वेदना को तो नहीं नकारा जा सकता।

संघ का वर्तमान नेतृत्व ना तो विद्यमान चुनौतियों के अनुरूप अपनी प्रतिकार क्षमता को विकसित कर पाया, ना समाज में उस इस्लामिक जिहाद से प्रतिकार शक्ति को दिशा दे पाया, ले दे कर समाज में यह संदेश प्रसारित हो गया कि केंद्र तथा कुछ राज्यों में भाजपा की सत्ता को ही वह अंतिम लक्ष्य प्राप्ति मान लें।

और परिणाम यूजीसी के नए नियमों, अल्पसंख्यक मंत्रालय को 3400 करोड़ रुपए, पिछड़ा आरक्षण में पिछले दरवाजे से संविधान विरुद्ध आरक्षण मुसलमानों को दिया जा रहा है। हमारे पैसे से चलने वाले विश्वविद्यालों में हिंदू विरोधी राष्ट्रविरोधी गतिविधियां चल रही है।

तो स्थिति का आंकलन करिए और अपने अंदर संघर्ष का संकल्प विकसित करिए।

(उपरोक्त संकलन अशोक चौधरी जी के फेसबुक वॉल से लिया गया है। अशोक चौधरी जी संघ विचारधारा से जुड़े हैं और आहुति नामक एक सामाजिक संगठन का संचालन भी करते हैं और अच्छा लिखते भी हैं)

साभार-

~ अशोक चौधरी

अध्यक्ष - आहुति अलीगढ़

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