BREAKING NEWS- माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने सुनाया फैसला : शंकराचार्य के मामले में मिली जीत,षड्यंत्र हुए धराशायी
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Wed, Mar 25, 2026
प्रयागराज- पूज्य ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी व उनके शिष्य दण्डी स्वामी मुकुंदानंद पर लगाये गए आरोप को खंडित करते हुए माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने आज फैसला सुनाया।
माननीय न्यायालय ने पीड़ित की तरफ से प्रस्तुत दलीलों और आवेदक की तरफ से प्रस्तुत तथ्यों को सुनते हुए अपना फैसला दिया है। यौन शोषण के मामले में शंकराचार्य की तरफ से दिए गए आवेदन को स्वीकार कर उन्हें अग्रिम जमानत दिया है।

अदालत में क्या क्या विंदु रखे गए थे और किस मानकों पर बहस हुई और क्या फैसला आया है वह सभी आपके सुविधा हेतु निम्नवत हिंदी में अनुवादित प्रस्तुत है-
हाई कोर्ट आदेश का हिंदी अनुवाद (सरल भाषा में)

🔹 1. प्रारंभिक बातें
• यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) से जुड़ा है।
• आवेदन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी एवं एक अन्य द्वारा किया गया।
• मामला POCSO Act (बाल यौन अपराध) और BNS की धाराओं से संबंधित है।
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🔹 2. आवेदकों (Applicants) की दलीलें
आवेदकों के वकील ने कहा:
• उन्हें झूठा फँसाया गया है।
• पीड़ित (victims) कभी भी उनके आश्रम में छात्र नहीं थे।
• FIR देरी से और कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुई, जो संदेह पैदा करता है।
• घटनाओं की तारीख और स्थान में बार-बार बदलाव (contradictions) हैं।
• पीड़ितों को जांच अधिकारी के सामने ठीक से प्रस्तुत नहीं किया गया।
• पीड़ित पहले सूचक (informant) के प्रभाव में थे।
• एक पीड़ित घटना के समय बालिग (major) था।
• मेडिकल रिपोर्ट में कोई स्पष्ट चोट या प्रमाण नहीं मिला।
• डॉक्टर की राय “sexual assault को नकारा नहीं जा सकता” — पर ठोस आधार नहीं।
• आरोपों का उद्देश्य उनकी छवि खराब करना है।
• सूचक का क्रिमिनल इतिहास (21 केस) है और वह झूठे मुकदमे करता है।
• मीडिया ट्रायल के कारण उन्हें सीधे हाई कोर्ट आना पड़ा।
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🔹 3. राज्य (State of UP) की दलीलें
सरकार की तरफ से कहा गया:
• पहले सेशन कोर्ट जाना चाहिए था, सीधे हाई कोर्ट नहीं।
• आरोप गंभीर और जघन्य (heinous) हैं।
• पीड़ितों ने अपने बयान में आरोपों की पुष्टि की है।
• आरोपी प्रभावशाली हैं — वे गवाहों को डरा या प्रभावित कर सकते हैं।
• जांच में कुछ गवाहों ने पीड़ितों की उपस्थिति साबित की।
• POCSO Act की धारा 29 के तहत आरोपियों के खिलाफ अनुमान बनता है।
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🔹 4. प्रथम सूचक (Informant) की दलीलें
• आरोपी बहुत प्रभावशाली हैं — जमानत मिलने पर वे गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं।
• अन्य बच्चों के साथ भी शोषण हुआ है।
• आरोपी साक्ष्य से छेड़छाड़ कर सकते हैं।
• सूचक पर हमला हुआ — जिससे खतरे की बात सामने आती है।
• आरोपी जांच के दौरान भी यात्रा (यात्रा/रैली) कर रहे हैं और दबाव बना रहे हैं।
• शंकराचार्य होने का दावा विवादित बताया गया।
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🔹 5. कोर्ट का विश्लेषण (Analysis)
कोर्ट ने महत्वपूर्ण बातें नोट कीं:
⚖️ प्रक्रिया संबंधी
• हाई कोर्ट सीधे जमानत दे सकता है विशेष परिस्थितियों में।
• इस केस में Special Judge के आदेश से FIR हुई, इसलिए यह विशेष परिस्थिति मानी गई।
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⚖️ तथ्यात्मक संदेह (Important Doubts)
कोर्ट ने कई गंभीर सवाल उठाए:
1. FIR दर्ज करने में 6 दिन की देरी — कारण “पूजा” बताया गया।
2. पीड़ित सूचक के साथ ही रहे, अभिभावकों के पास नहीं थे।
3. पीड़ितों के बयान और FIR में तारीख/स्थान अलग-अलग हैं।
4. पीड़ितों ने माता-पिता की बजाय एक अजनबी (सूचक) को बताया — असामान्य व्यवहार।
5. एक पीड़ित घटना के समय बालिग था।
6. मेडिकल रिपोर्ट में कोई स्पष्ट चोट नहीं और निष्कर्ष भी पक्का नहीं।
7. पीड़ित आश्रम के छात्र नहीं बल्कि हरदोई के स्कूल के छात्र थे।
8. मीडिया में पीड़ितों के इंटरव्यू देना POCSO नियमों के खिलाफ है।
9. आरोप और प्रशासनिक विवाद (संगम स्नान) का समय एक ही दिन — संदेह पैदा करता है।
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⚖️ धारा 29 POCSO पर कोर्ट का दृष्टिकोण
• कोर्ट ने कहा:
👉 धारा 29 का “गुनाह का अनुमान” चार्ज फ्रेम होने से पहले लागू नहीं होता।
• इसलिए केवल इस आधार पर जमानत नहीं रोकी जा सकती।
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🔹 6. कोर्ट का निर्णय
👉 कोर्ट ने कहा कि:
• मामले में संदेह और विरोधाभास (contradictions) हैं
• बिना केस के merits पर राय दिए
• अग्रिम जमानत दी जा सकती है
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🔹 7. जमानत की शर्तें
आरोपियों को ₹50,000 के बॉन्ड पर जमानत दी गई, शर्तें:
1. सबूत से छेड़छाड़ नहीं करेंगे
2. गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे
3. कोर्ट में उपस्थित रहेंगे
4. भारत से बाहर नहीं जाएंगे बिना अनुमति
5. मीडिया में इंटरव्यू नहीं देंगे
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✅ Final Conclusion (संक्षिप्त निष्कर्ष)
👉 इस पूरे केस में कोर्ट ने पाया कि:
• FIR और गवाहों के बयान में कई विरोधाभास (contradictions) हैं
• मेडिकल और अन्य साक्ष्य निर्णायक नहीं हैं
• पीड़ितों के व्यवहार और रिपोर्टिंग में असामान्य परिस्थितियाँ हैं
• FIR दर्ज करने में देरी और संदेह है
➡️ इसलिए कोर्ट ने कहा कि:
👉 Prima facie (प्रथम दृष्टया) मामला इतना मजबूत नहीं है कि अग्रिम जमानत न दी जाए
✔️ परिणाम:
👉 आरोपियों को अग्रिम जमानत दे दी गई (कुछ शर्तों के साथ)
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