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बड़ी खबर - भगवा राजनीति,सन्तो के मंच से गो हत्या प्रतिबन्ध नदारद : VHP और RSS प्रमुख की उपस्थिति में संत सम्मेलन

Editor

Mon, Apr 6, 2026

बेंगलुरु -

भगवाधारियों के मंच से गो माता का सम्मान व गो हत्या पर प्रतिबंध जैसे मुद्दे गायब,कोई भी संत नही उठा सका आवाज।

कल बेंगलुरु में संपन्न हुए हिंदू आचार्य सभा के दो दिवसीय सम्मेलन में हिंदुओं के 36 संप्रदायों के 81 प्रमुख आचार्य उपस्थित रहे।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत, गृहमंत्री अमित शाह और विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी इसमें भाग लिया।

इस सम्मेलन में सामाजिक समरसता, मंदिरों की सरकारी कब्जे से मुक्ति तथा घर वापसी जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई। परन्तु हिंदुओं की आस्था व हिन्दू धर्म की मूल समझी जाने वाली गो माता की हत्या पर प्रतिबंध जैसे मुद्दे गायब रहे। कोई भी भगवा धारी संत इस मुद्दे पर कोई आवाज नही उठाया। जबकि इस समय गो माता के सम्मान की चर्चा देश भर में चल रहा है। इस मुद्दे को हिन्दू धर्म के सर्वोच्च समझे जाने वाले पूज्य शंकराचार्य महाभागों ने मुखरता से उठाया है,और निरंतर उठा भी रहे हैं,देश में गो माता राष्ट्र माता प्रतिष्ठार्थ आंदोलन भी छेड़ रखा है। लेकिन इस धर्म सभा में गो माता की कोई बात नही की गई। यदि बात करें हिन्दू धर्म के लोगों की तो सच्चे सनातनी यह कहते देखे जा रहे हैं कि ऐसे सन्तो को गो माता के सम्मान की बात क्यों नजर नही आ रही है। वर्तमान समय में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने तो उत्तरप्रदेश में गो प्रतिष्ठार्थ धर्मयुद्ध का शंखनाद तक कर दिया है। वह यूपी में सरकार को आड़े हाथों लिया है और गो माता को राज्य माता बनाने का बिगुल बजा दिया है। उनके हर संबोधनों में गो माता को सम्मान दिए जाने व गो हत्या को प्रतिबन्ध किये जाने की बात कहते देखा जा रहा है। ऐसे में अन्य संतों से सवाल यह भी है कि जो अपने मंचों से गो माता की जय बोलते हैं उन्हें सरकारी प्रमुखों के समक्ष गो माता का नाम लेना क्यों भारी पड़ गया?

हालांकि,मंच से बताया गया कि समान नागरिक संहिता अभी 3 राज्यों में लागू हो गई है और इसी वर्ष सभी भाजपा शासित प्रदेशों, यानी देश की 83% जनसंख्या इस के अंतर्गत आ जाएगी।

सरकार जनसंख्या असंतुलन पर भी एक आयोग का गठन करने जा रही है। यह सम्मेलन महामंडलेश्वर आचार्य अवधेशानंद की अध्यक्षता एवं स्वामी परमात्मानंद सरस्वती के संयोजन में संपन्न हुआ।

सवाल के घेरे में संत समाज ? -

बंगलुरू में हुए इस संत सम्मेलन को राजनीति व चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। कारण,मंच पर गृहमंत्री अमित शाह व आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की उपस्थिति बताया जा रहा है। आम हिंदुओं ने सत्ता के मंच पर संतों की विशेष उपस्थिति को भ्रामक बताते हुए सोशल मीडिया पर कमेंट्स करते पाए गए कि क्या सन्तों ने सत्ता की वकालत करने के लिए भगवा पहना है। क्या किसी संत की नैतिक जिम्मेदारी नही बनती की वह गो माता को सम्मान देने की बात सरकार से करे? क्या चुनाव व राजनीतिक लाभ के लिए संत एकजुट हुए बैंगलौर में । यह तमाम ऐसे सवाल हैं जो संत सम्मेलन को घेर रहे हैं और सवालिया निशान खड़ा कर रहे हैं।

इस वक्त केंद्र में भाजपा की सरकार है। और भाजपा को हिंदुत्ववादी संगठन माना जाता है। इस दल का कोर वोटर हिन्दू ही है लेकिन मंशा पर सवाल व संदेह पैदा हो रहा है।

हालांकि,सरकार किसी एक विशेष धर्म की नही होती सरकार तो धर्मनिरपेक्ष की शपथ ले रखी होती है। लेकिन साधु संत का चोला विशेष धर्म के लिए होता है,संत धर्म निरपेक्ष हो ही नही सकते। फिर दोनों एक मंच पर कैसे ?

हिन्दू हैं तो गो माता की बात करनी होगी -

हिंदुओं के आस्था की मूल गो माता को समझा जाता है। हर हिन्दू अपने चूल्हे की पहली रोटी गो माता के नाम से निकालता है उसके बाद भोजन करता है। गाय को वेदों में भी सम्मान दिया गया और भगवत अवतारों ने भी इस महत्व को सम्मान दिया। श्री कृष्ण भगवान इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं गो सेवक बनकर उन्होंने गो चारण किया और ग्वालबाल कहलाये। हर हिन्दू भगवान की पूजा करता है हिन्दू परंपरा पर विश्वास करता है और गाय उस विश्वास की आस्था है।

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