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शंकराचार्य को जान से मारने की मिली धमकी

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: कश्मीर से कन्याकुमारी तक लहराया गो प्रतिष्ठा ध्वज,ये हैं ऐसे पहले शंकराचार्य

प्रयागराज - वैसे तो भारत भूमि अनेकों अवतारों के शौर्य गाथाओं से परिपूर्ण है। ऋषि मुनियों तपस्वियों के संकल्प साधना के तप बल से भारत गौरवांवित है। धार्मिक महत्वों व सनातन के तेज से परिपूरित हमारी अखंडता जब खंडित व दिग्भर्मित होने लगी थी,तब पुरातन सनातन संस्कृति व धर्म की रक्षा हितार्थ एक सूत्र में बांधने का कार्य आदि गुरु शंकराचार्य ने हजारों वर्ष पहले किया था। आज बचे हुए मन्दिर व पूजन पाठ,सभ्यता,वेद वेदांग की शिक्षा आदि शंकराचार्य के त्याग व संकल्प की याद कराते हैं। हमारे हिन्दू धर्म के सर्वोच्च धर्म गुरुओं,आचार्यों ने अपना बलिदान देकर सनातन की रक्षा की । धर्म कभी दासता स्वीकार नहीं करता, अनर्गल प्रपंच के आगे घुटने नहीं टेकता । और जो घुटने टेक दे वह धार्मिक महत्व को नहीं समझता । धर्म की धार धीमी तो है लेकिन सटीक व लक्ष्य भेदी है। जो सच होगा वह प्रखर होगा,जो सनातन का धर्म उपदेशक होगा वह निश्चितरूप से शास्त्र व सत्य का पक्षधर होगा,और जो सत्य व शास्त्र सम्मत नहीं वह धर्म का गुरु हो ही नहीं सकता । जो गाय, गंगा, गायत्री,गीता, गुरुकुल,गोकुल व मन्दिर की चिंता नही करता वह सनातनी भला कैसे हो सकता है।  [caption id="attachment_4846" align="aligncenter" width="300"] जगह जगह जोरदार स्वागत हुआ पूज्य शंकराचार्य जी का[/caption] दशको पूर्व हमारे देश व समाज में गाय,गुरुकुल की स्थिति इतनी भयावह नहीं थी,जितनी आज हो गई है। आज सत्ता में शोर है लेकिन शांति का भोर नहीं है,रोशनी तो है लेकिन सूर्य का वह तेज नहीं । वह कलरव नहीं जो पहले था,वह गोधूलि बेला नहीं जहां गायें रंभाती थी। पहले गायों की पूजा होती थी,गो वंश को सहेजा जाता था,लेकिन आज काटा जाता है। इसी पीड़ा को दूर करने सनातन के प्रमुख आचार्य ने गौ प्रतिष्ठा आंदोलन का बीड़ा उठाया है। विरले ही होते हैं,जो गायों की चीख व करुण पुकार को सुनकर विचलित हो जाते हैं उनकी रक्षा के लिए,सनातन की मूल को सहेजने के लिए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती उनमें से एक हैं। जी हां, ज्योतिष्पीठ के वर्तमान शंकराचार्य जो काफी प्रखर-प्रचंड व तेज तर्रार देखे जाते हैं वे आजकल एक महाअभियान में बड़ी स्पष्टता के साथ संकल्पित हैं। गो संवर्धन व गो प्रतिष्ठा के कार्य को लेकर पूरे भारत की यात्रा पर निकलने वाले शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अखंड भारत की परिक्रमा करके पूरे देश में गौ के प्रति एक सकारात्मक माहौल खड़ा कर दिया है। "गो प्रतिष्ठा ध्वज भारत यात्रा" की जोरदार चर्चा होने लगी,यह यात्रा शंकराचार्य ने अयोध्या से आरंभ की थी। दिल्ली में चातुर्मास पूर्ण करने के तुरंत बाद भगवान श्री राम की जन्मभूमि से गो प्रतिष्ठा का संकल्प यात्रा आरंभ कर भगवान श्री कृष्ण की नगरी वृंदावन में यात्रा को विराम दिया। ऐसी यात्रा करने वाले ये पहले शंकराचार्य हैं,जो गो प्रतिष्ठा की अलख जगाने पूरे भारत भूमि की प्रदीक्षणा की। पूर्वोत्तर राज्यों में भी लहराया गो प्रतिष्ठा ध्वज- पूर्वोत्तर के राज्यों में जहां सनातनी विचारधारा व संस्कृति पर आज भी कुठाराघात है,जहाँ गायों की बहुतायत में हत्या कर उनके मांस का भक्षण किया जाता है। जहाँ बड़े से बड़ा हिन्दू नेता या अपने आपको तुर्रम खा समझने वाला व्यक्ति मौन हो जाता है,वहां शंकराचार्य पहुंचे और अपनी बात रखी,गौ ध्वज को लहराकर लौटे। भले उन्हें राजनीतिक कुंठित मानसिकता का दंश झेलना पड़ा हो लेकिन अपने संकल्प को डिगने नही दिया,झंडा लहराकर ही आये। मेघालय में 22 हजार फीट की ऊंचाई पर होकर सनातनियों से गौ माता को राष्ट्र माता बनाने की अपील की,और मेघों के समीप,बीच जाकर गो ध्वज का संकल्प पूर्ण किया। यह तब होता है जब मन में कोई कुटिलता न हो कोई दुविधा न हो और अपना उद्देश्य साफ हो। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य का स्टंट सनातनियों के हित की मूल गौ प्रतिष्ठा को लेकर बिल्कुल क्लियर है। सनातनियों में जगी आस - भारत के लगभग हर राज्य में स्वामी जी की संकल्प पताका को स्थान मिला और उनकी बातों को सम्मान मिला है। चाहे वह जम्मू कश्मीर हो,लेह लद्दाख हो या फिर कन्याकुमारी। उत्तर से दक्षिण,पूरब से पश्चिम सभी दिशाओं के राज्यों में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महराज के सार्थक उद्देश्यों की पूर्ति का बिगुल बजा है। लोग एकजुट होकर गौ माता को राष्ट्र माता बनाने का अपना समर्थन दिया है।  सियासत के गलियारों में मची खलबली - जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गौ प्रतिष्ठा आंदोलन की नींव रखी और गर्मी में पैदल यात्रा शुरू की तो दिल्ली दरबार में हड़कंप मच गया। जब सन्यासी नंगे पांव निकलता है तो राहें भीं थर्राने लगती हैं,कंकड़ पत्थर व खड़बीहड़ रास्तों से चलकर दिल्ली संसद भवन तक पहुंचते पहुंचते सत्ताधीशों के बीच खलबली मच गई थी। उसके बाद,इस यात्रा से नेताओं ने गाय को गले लगाकर फ़ोटो खिंचवाया और सांकेतिक रूप से बताया कि वे भी गौ प्रेमी  हैं। जो कि राजनीतिक जीवन की एक नई चाल कैमरे में कैद हो रही थी। कोई आशीर्वाद के बहाने आया तो कोई पादुका पूजन करने आगे आया। हर दल के वरिष्ठ नेताओं ने मिलकर आशीर्वाद लिया। महाराष्ट्र ने दिखाई तत्परता,राज्य माता की घोषणा- महाराष्ट्र में तो सकारात्मक रुख इतना था कि, राज्य सरकार ने गाय को राज्य माता का दर्जा देने की घोषणा कर दी और मंच पर ही जहां शंकराचार्य उपस्थित थे, उनके हाथों में मुख्यमंत्री ने स्वयं जाकर प्रस्ताव की कॉपी पकड़ाया। कइयों ने आशीर्वाद लिया और अपने आपको गो माता को राष्ट्र माता बनाने की मुहिम का प्रबल समर्थक बताया। पर,चर्चा व माहौल देश भर में बना,सरकारों के माथे पर बल आ गया की गाय को राष्ट्र माता कैसे बनाया जाय। [caption id="attachment_4850" align="aligncenter" width="300"] महाराष्ट्र के फडणवीस श्री शंकराचार्य जी का आशीर्वाद ले रहे[/caption] इस भारत यात्रा से शंकराचार्य की छवि काफी अच्छी हुई। जो नकारात्मक छवि इनकी बनाई गई थी,उस नैरेटिव को तोड़ कर पॉजिटिव माहौल बनता दिख रहा है। ये पहले ऐसे शंकराचार्य हैं जो कि गौ की हत्या को बन्द कराने, गो के संवर्धन, सम्मान को लेकर पूरे भारत की अनवरत यात्रा की । अब यात्रा का विराम कर छत्तीसगढ़ प्रवास पर हैं। दीपावली पूजन बाद नए अध्याय की नई शुरुआत कर सकते हैं पूज्य शंकराचार्य महराज ।

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