: भ्रष्टाचार की बारिश में बह गया पुल : सुबह जीरो और शाम को हुआ 15 लाख का नुकसान.जानें क्या है सच!
Admin
Tue, Jul 26, 2022छत्तीसगढ़ / बालोद - बालोद जिले के परेमुंडा व वरही के बीच बना पुल बारिश में बह गया। यह पुल हालांकि 2007 का बना था । लेकिन लगभग एक महीना पूर्व ही इसकी मरम्मत व शेष निर्माण कार्य किया गया था। स हेतु 50 लाख का इस्टीमेट बनाया गया था,काम भी हुआ लेकिन उस कार्य की पोल बारिश ने खोल दी।
यह मामला बड़े भ्रष्टाचार को उजागर करता है, क्योंकि पीडब्ल्यूडी विभाग के कार्यपालन अभियंता ने मीडिया को दिए बयान में और जारी प्रेस विज्ञप्ति में उसी पुल के निर्माण कार्य मे लगी लागत में ही बयाने अंतर बता दिया। पहले बताया कि 50 लाख का इस्टीमेट बनाया गया था,लेकिन मरम्मत कार्य मे कोई पैसा नही लगाया गया,क्योंकि विभाग में डैमेज पाइप व मटेरियल उपलब्ध था,तो उसी के सहारे जुगाड़ से पुल की मरम्मत की गई ,जिसमे कार्यपालन अभियंता ने खुद की वाहवाही बताई है। अचानक 12 घण्टे बाद जब मीडिया ने संबंधित मामले में सवाल दाग़ा तब श्रीमान जी के सुर बदल गए ,उन्होंने तत्काल कह दिया कि क्षतिग्रस्त पुल के निर्माण कार्य मे 15 लाख रुपये लग गए हैं।
[caption id="attachment_2186" align="aligncenter" width="300"]
परेमुंडा-बरही के बीच क्षतिग्रस्त पुल (फ़ोटो)[/caption]
क्यों बदल गए अधिकारी के 12 घण्टे में 15 लाख के सुर-जांच होगी या फ़ाइल गई फील गुड में ?-- जरा गौर करें,कि जिस पुल के मरम्मत में डैमेज पाइप को लगाकर कार्य होना बताया गया वो भी किसी खास लागत के बगैर ! तो अचानक 12 घण्टे में यह बिना लागत लगी हुई मरम्मत का, सुर बदल कर 15 लाख खर्च पर कैसे राग लेने गया। इसको समझेंगे तो पाएंगे कि खेल कहीं और से संचालित है और वह खेल है बन्दरबांट करने का। 50 लाख का इस्टीमेट,15 लाख खर्च और हकीकत में जीरो, मजे की बात यह कि, जिस पर खर्च करना बताया अब वह भी नहीं,इन्द्रदेव की कृपा से वह तो पानी मे बह गया। अब अधिकारी कार्य का भौतिक निरीक्षण कर भी नही सकते,क्योंकि पूल तो है ही नहीं। तब यह प्लान बनाया गया कि बहे हुए पुल को ही कमाई का जरिया बना लिया जाय और 15 लाख तो झटक लिया जाय। खेला होबे साहब, खेला ! रात भर में स्वप्न बदल गए,पैसों के सुर सुनाई देने लगे। अब इसका होगा क्या,क्या जांच होगी,भ्रष्टाचार पकड़ा जाएगा या फिर किसी आका का फोन आ जायेगा कि अधिक होशियार मत बनो! जो हो गया सो हो गया। मतलब फ़ाइल,फील गुड में फिक्स हो जाएगी।
हालांकि यह मामला कलेक्टर तक पहुंचा,तो कलेक्टर ने मीडिया को वही घिसा पिटा रटा रटाया उत्तर सुना दिया,कि इस मामले की जांच होगी। जब कि होना यह चाहिए था कि मीडिया की पुष्ट खबरों पर संज्ञान लेते हुए धरातलीय निरीक्षण कर जिम्मेदार अधिकारियों ,अभियंता व ठीकेदार के ऊपर त्वरित कार्रवाई करते,तब प्रशासन की पारदर्शिता समझ मे आती । लेकिन पहला पत्थर मारे कौन,शर्त है कि जो चोरी न किया हो,जो पाप न किया हो,वही पत्थर मार सकता है। यहां तो पत्थर मारने की छोड़िए,उठाने की भी हिम्मत नही है। यह पोल खुलता भी नही , जब मीडिया ने जारी प्रेस विज्ञप्ति व लिए गए बाइट पर बारीकी नजर डाली तब पता चला कि इंजीनियर साहब तो खेला कर गए,सुबह कहा कोई खर्च नही हुआ,और शाम को कहा कि 15 लाख का हो गया नुकसान. मतलब 15 लाख बह गए पानी मे । अब देखना होगा कि क्या सही में जांच होगी या भ्रष्टाचार की आंच होगी तेज । लगता है अब भ्रष्टाचार का गढ़ बन रहा 36 गढ़ !!
परेमुंडा-बरही के बीच क्षतिग्रस्त पुल (फ़ोटो)[/caption]
क्यों बदल गए अधिकारी के 12 घण्टे में 15 लाख के सुर-जांच होगी या फ़ाइल गई फील गुड में ?-- जरा गौर करें,कि जिस पुल के मरम्मत में डैमेज पाइप को लगाकर कार्य होना बताया गया वो भी किसी खास लागत के बगैर ! तो अचानक 12 घण्टे में यह बिना लागत लगी हुई मरम्मत का, सुर बदल कर 15 लाख खर्च पर कैसे राग लेने गया। इसको समझेंगे तो पाएंगे कि खेल कहीं और से संचालित है और वह खेल है बन्दरबांट करने का। 50 लाख का इस्टीमेट,15 लाख खर्च और हकीकत में जीरो, मजे की बात यह कि, जिस पर खर्च करना बताया अब वह भी नहीं,इन्द्रदेव की कृपा से वह तो पानी मे बह गया। अब अधिकारी कार्य का भौतिक निरीक्षण कर भी नही सकते,क्योंकि पूल तो है ही नहीं। तब यह प्लान बनाया गया कि बहे हुए पुल को ही कमाई का जरिया बना लिया जाय और 15 लाख तो झटक लिया जाय। खेला होबे साहब, खेला ! रात भर में स्वप्न बदल गए,पैसों के सुर सुनाई देने लगे। अब इसका होगा क्या,क्या जांच होगी,भ्रष्टाचार पकड़ा जाएगा या फिर किसी आका का फोन आ जायेगा कि अधिक होशियार मत बनो! जो हो गया सो हो गया। मतलब फ़ाइल,फील गुड में फिक्स हो जाएगी।
हालांकि यह मामला कलेक्टर तक पहुंचा,तो कलेक्टर ने मीडिया को वही घिसा पिटा रटा रटाया उत्तर सुना दिया,कि इस मामले की जांच होगी। जब कि होना यह चाहिए था कि मीडिया की पुष्ट खबरों पर संज्ञान लेते हुए धरातलीय निरीक्षण कर जिम्मेदार अधिकारियों ,अभियंता व ठीकेदार के ऊपर त्वरित कार्रवाई करते,तब प्रशासन की पारदर्शिता समझ मे आती । लेकिन पहला पत्थर मारे कौन,शर्त है कि जो चोरी न किया हो,जो पाप न किया हो,वही पत्थर मार सकता है। यहां तो पत्थर मारने की छोड़िए,उठाने की भी हिम्मत नही है। यह पोल खुलता भी नही , जब मीडिया ने जारी प्रेस विज्ञप्ति व लिए गए बाइट पर बारीकी नजर डाली तब पता चला कि इंजीनियर साहब तो खेला कर गए,सुबह कहा कोई खर्च नही हुआ,और शाम को कहा कि 15 लाख का हो गया नुकसान. मतलब 15 लाख बह गए पानी मे । अब देखना होगा कि क्या सही में जांच होगी या भ्रष्टाचार की आंच होगी तेज । लगता है अब भ्रष्टाचार का गढ़ बन रहा 36 गढ़ !! विज्ञापन
विज्ञापन