माँ गंगा का तट बना कुरुक्षेत्र - : कमल और कमंडल के बीच फंसा हिंदुस्तान,असली हिन्दू कौन
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Mon, Jan 26, 2026
प्रयागराज - सनातनी समाज में धर्मसत्ता का बड़ा योगदान है। मां गंगा धर्मसत्ता का नेतृत्व करती हैं राजसत्ता का नहीं। प्रयागराज के त्रिवेणी तट पर जो माघ मेला का आयोजन होते आ रहा है उसके पीछे राजसत्ता का नहीं बल्कि धर्मसत्ता की परंपरा का अधिकार है,और इस परंपरा के संवाहक व सम्राट पूज्य शंकराचार्य होते हैं। यह आज का मनोनयन नही बल्कि ढाई हजार वर्षों पुरानी पारंपरिक वसीयत है।
मौनी अमावस्या के दिन लगभग 10 बजे सुबह के आसपास राजसत्ता की हनक ने धर्मसत्ता पर आघात किया और धर्म के प्राण संतों की ब्रह्मरन्ध्र पर प्रहार कर सनातन के स्वाभिमान को चोट पहुंचाई। इस पर विवाद छिड़ गया और वर्षों की परंपरा को क्षतिग्रस्त करने की पूर्व नियोजित कुटिल योजना का प्रयोग किया गया। जिसमें ज्योतिर्मठ के पूज्य शंकराचार्य की घेराबंदी की गई और उनके शिष्यों पर बटुक ब्राह्मणों, सन्यासियों,ब्रह्मचारियों पर लाठियां बरसाई गईं और पुलिस प्रशासन द्वारा चोटियां खींचकर घसीटा गया और पीटा गया। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को अपमानित कर उन्हें परंपरागत पालकी से उतरने का दबाव बनाया गया अपमानित किया गया। जिस गंगा तट पर मेले का सृजन करने की नींव का आधार शंकराचार्य हैं उसी मेले में सनातन के सर्वोच्च गुरु का अपमान करना न तो धर्मनीति के लिए उचित है और न ही राजनीति के लिए। क्योंकि धर्मनीति जो है राजनीति से कहीं ज्यादा व्यापक व महत्वपूर्ण है सनातनी संस्कार व जीवन में ।
आस्था के संगम में सत्ता का दंगल -
संगम नगरी इस बार दंगल का मैदान बन गई। आस्था का तट वाकयुद्ध का कुरुक्षेत्र नजर आया। माघ मेला परिक्षेत्र का सेक्टर 4 त्रिवेणी मार्ग में शिविर से बाहर शंकराचार्य फुटपाथ पर बैठे नजर आए वह भी तब जब देशभर के सनातनी गंगा में डुबकी लगा रहे थे । सनातनियों के सर्वोच्च आचार्य स्तब्ध अपमान से पीड़ित बिना गंगा स्नान किये चुपचाप किये गए अपमान का घूंट पी रहे थे। यह शायद पहली बार गंगा मैया के तट पर हुआ है, जब कोई शंकराचार्य सत्ता के क्रूरता का शिकार हुए।
मीडिया के कैमरे में कैद चोटी की चोट ने मचाया बवाल - मौनी अमावस्या पर जब प्रशासन सन्तो पर लाठियां बरसा रहा था तो कैमरे में वह मंजर कैद हो गया। ब्रह्मचारी की चोटी पकड़कर घसीटना और निर्वस्त्र करना ,फिर जमीन पर पटककर मारना भी मीडिया के कैमरे में कैद हो गया। और जब वह बाहर आया तो फिर बवाल मच गया कि सनातन की सत्ता का अपमान हो गया। शंकराचार्य को पुलिस ने घेरकर उन्हें अलग किया और अपमानित करके बाद में शिविर के बाहर छोड़ गया। उसी स्थिति में आज तक बैठे हैं शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ।
7 दिनों से चल रहा मान अपमान का खेल - इन दिनों शंकराचार्य शिविर के बाहर मीडिया और दूर दराज से पहुंचे सनातनियों की भीड़ जुटी हुई है। क्योंकि मौनी अमावस्या से स्नान कराने ले जाने की प्रतीक्षा में बैठे हैं ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज। 18 जनवरी मौनी अमावस्या से 25 जनवरी अचला सप्तमी तक सनातन व सत्ता के बीच आरोप प्रत्यारोप ही चल रहा है मीडिया माध्यम बनी हुई है और सनातनी जनता तनातनी का आधार । एक तरफ शुद्ध सनातनी विचारधारा की हुंकार तो दूसरी तरफ राजनैतिक सनातनियों की हुड़दंग।
राजसत्ता व धर्मसत्ता आमने सामने है। विवाद गहरा होते जा रहा है। कोई मध्यस्तता करने को तैयार नहीं है। राजनैतिक दल जो सत्ता में नही हैं वह पहुंच रहे हैं शंकराचार्य जी के समर्थन में और सत्ता की हनक इतनी की कोई पार्षद भी वहां जाने से परहेज कर रहा है।
कमल और कमंडल के बीच बंटता हुआ हिंदुस्तान का चेहरा गंगा तट पर इन दिनों दिखता नजर आ रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को शंकराचार्य न होने का दावा भी किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर उनके शिविर में नोटिस चस्पा कर शिविर खाली करने का अल्टीमेटम भी मेला प्राधिकरण ने भेजा है।
विवादों के बीच शंकराचार्य हुए एकजुट - वैसे तो देश भर में चार ही पीठ अधिकृत हैं जिसे आदि गुरु शंकराचार्य जी ने ढाई हजार वर्ष पूर्व स्थापित किये थे। और कहा था कि इन चारों पीठों पर जो भी प्रमुख रूप से आचार्य होंगे उन्हें ही शंकराचार्य कहा जायेगा । लेकिन राजसत्ता ने धर्म सत्ता पर अपना नियंत्रण करने की कोशिश करते हुए अनेकों शंकराचार्य बनाने का कुटिल प्रयास किया और सन्तो में बंटवारा भी।
जो राजसत्ता के सुख व वैभव के बैनर तले आ गए वह राज संत कहलाये और जिन्होंने धर्म की मर्यादा व आचरण को संभाले रखा वह धर्म सत्ता के सत्य सनातनी कहलाये। राजसत्ता का दंड इस वक्त धर्म सत्ता पर हावी है। जबकि पुरातन सभ्यता धर्म सत्ता की रही जिसमें परंपराएं जीवित बची रहीं। आज उन परंम्पराओ को लपेटने का कार्य चल रहा है।
क्या है माहौल - इन दिनों माहौल बदला सा है। गंगा तट पर कोहराम मचा है। गो माता को राष्ट्र माता बनाने का संकल्प तेज हो गया है। शंकराचार्य अनशन पर हैं,संत व सत्ता के बीच का द्वंद प्रगाढ़ होते जा रहा है। बात बस इतनी सी है कि शासन प्रशासन आकर माफी मांग ले और ससम्मान संगम स्नान कराने ले जाय तो शंकराचार्य का अनशन टूट जाएगा। परन्तु,हठ और टेक के बीच फंसा है मामला। सत्ता पक्ष अपने अकड़ में है और धर्म सम्राट अपनी टेक पर हैं। शंकराचार्य जी से जब पूंछा जाता है कि आपका टेक किससे है तो उनका कहना है कि मां गंगा से एक बेटे का टेक है कि जब तक आदर पूर्वक स्नान नही कर लेते तब तक यूं ही बैठे रहेंगे।
सत्ता से दूरी बनाने लगा सनातनी समाज - एक तरफ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर जनता का भरोसा उठते जा रहा है। सूत्रों की माने तो लोग अब दूर होते जा रहे हैं और कह रहे हैं कि सनातन की सरकार में वैदिक संत समाज की प्रताड़ना और शंकराचार्य जी का अपमान सहन नही होगा । धर्म की आड़ लेकर बनी सरकार अब सनातन का ही अपमान कर साधु संतों पर ही लाठियां चलवा रही है तो फिर भाजपा की सरकार और अन्य दलों की सरकार में क्या अंतर रह गया। बहुतायत लोगों की माने तो धर्मसत्ता का शासन राजसत्ता पर होना उचित बता रहे और राजसत्ता को धर्म सत्ता का आज्ञा पालक ।
अब इंतजार है योगी आदित्यनाथ के आने और मामले के पटाक्षेप का । हालांकि सत्ता पक्ष के डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने शंकराचार्य जी को दण्डवत प्रणाम कर स्नान करने के लिए निवेदन किये हैं परंतु शिविर तक पहुंचे नही हैं। उधर विपक्ष भी कह रहा है कि वह ले जाएगा पूज्य शंकराचार्य जी को स्नान कराने । लेकिन एक मत खबर टाइम्स का यह भी है कि यदि राजनैतिक दल या शासन प्रशासन नही आता है तो धर्म सम्राट के साथ सभी धर्माचार्यों को सन्तो को एकजुट होकर आगे आना चाहिए और पूज्य शंकराचार्य जी को ससम्मान स्नान कराकर उनके टेक को पूरा करना चाहिए,क्योंकि शंकराचार्य की जितनी मर्यादा संत समाज व धर्मसत्ता समझेगा उतना राजसत्ता नहीं।
अब देखना यह होगा कि ज्योतिष्पीठाधीश्वर की टेक का सम्मान कौन रखता है धर्मसत्ता के मानविन्दुओं को समझने वाले साधु संत या फिर राजनैतिक दखल रखने वाले राजनैतिक दल या फिर शासन सत्ता ?
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