छत्तीसगढ़िया आदिवासी बहुल राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री की ही दरकार..तो क्या नंदकुमार साय परफैक्ट हैं !! आइये जानते हैं उन्होंने क्या कहा...
रायपुर
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राजनीति शतरंज है, विजय यहाँ वो पाय.
जब राजा फँसता दिखे पैदल दे पिटवाय..
जी हां,राजनीति संभावनाओं और असँभावनाओं के बीच का भंवर जाल भी है तो रणनीतिक खेल का दाव-पेच भी.यह शतरंज की विसात पर पसरा खेल भी है तो मौका परस्ती की कुटिल चाल भी.मल्ल युद्ध का मैदान भी राजनीति है तो भावनाओं के आधार पर संभावनाओं को तलाशने की मशीन भी.राजनेता,राजनीतिक फतह के लिए किसी को कभी भी पिटवा सकते हैं और खुद पिट भी सकते हैं,क्योंकि उन्हें राजनीति में जीत दर्ज जो करनी है.सन 2003 की बात है जब अजीत जोगी मध्यप्रदेश से विलग हुए नए राज्य छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री बने तब तत्कालीन आदिवासी समुदाय के बड़े नेता और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार साय प्रथम नेता प्रतिपक्ष रहे.बात उन्ही दिनों की है जब एक रैली के दौरान सत्ता पक्ष ने लाठीचार्ज करवाकर प्रतिपक्ष नेताओं का सर फुटौवल करा दिया था,उसी में नंदकुमार साय भी चोटिल हुए.लेकिन जंगे-राजनीति में दर्द उनकी रफ्तार कम नही कर पाया.हालांकि पैर फ्रैक्चर था,प्लास्टर बंधा था परन्तु मन मे संकल्प था तत्कालीन प्रथम मुख्यमंत्री जोगी को दुबारा सरकार न बनाने देने का.यह बात खुद साय खबर टाइम्स से की चर्चा में बताते हैं.[caption id="attachment_3799" align="aligncenter" width="219"]
नंद कुमार साय बीजेपी सांसद[/caption]
जाने नंदकुमार साय के राजनीतिक सफर को-
1977-79 और 1985-89: सदस्य, मध्य प्रदेश विधान सभा (दो कार्यकाल)
1977-78 और 1986-88: सदस्य, विशेषाधिकार समिति, मध्य प्रदेश विधान सभा , अध्यक्ष, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति, मध्य प्रदेश विधान सभा।
1988-89: सदस्य, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति, मध्य प्रदेश विधान सभा
1989-1991: मध्य प्रदेश में रायगढ़ (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) से नौवीं लोकसभा सदस्य । अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी समिति
1990-91: सदस्य, वित्त मंत्रालय के लिए सलाहकार समिति सदस्य, गृह मंत्रालय के लिए सलाहकार समिति
1996-97: सदस्य, ग्यारहवीं लोकसभा (दूसरा कार्यकाल), मध्य प्रदेश में रायगढ़ (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) से
2000-2004: सदस्य, छत्तीसगढ़ विधान सभा
2004-2009: सदस्य, चौदहवीं लोकसभा (तीसरा कार्यकाल) - सदस्य, छत्तीसगढ़ में सरगुजा (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) से। निजी सदस्यों के विधेयकों और संकल्पों पर समिति सदस्य, ऊर्जा 2004 समिति, सदस्य, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के लिए सलाहकार समिति
अगस्त 2009: राज्यसभा के लिए चुने गए
जून 2010: राज्यसभा के लिए फिर से चुने गए।
अगस्त 2010 - मई 2014 और सितंबर 2014 आगे: सदस्य, कोयला और इस्पात समिति अगस्त 2010 - मई 2014 सदस्य, शहरी विकास मंत्रालय के लिए सलाहकार समिति मई 2012 - मई 2014 और अगस्त 2014 के बाद सदस्य, समिति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण बोर्ड
2014 से आगे: सदस्य, सामाजिक न्याय और अधिकारिता संबंधी समिति सदस्य, पटल पर रखे गए कागजात संबंधी समिति। 28 फरवरी 2017 को, नंद कुमार साय ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष के रूप में पदभार ग्रहण किया।और मरवाही विधानसभा से खुद चुनाव लड़कर प्रदेश भर में चुनाव प्रचार बीजेपी के पक्ष में किया और सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाई. नंद कुमार से पूछे गए सवालों के जबाब में बेबाक होकर उन्होंने जो कहा वह शब्दशः आपके सामने है-
आप लंबी अवधि से राजनीति में हैं,आदिवासी बहुल राज्य के आदिवासी चेहरा हैं,बीजेपी से सांसद,विधायक व अन्य महत्पूर्ण पदों पर रहे हैं,बावजूद इसके मुख्यमंत्री क्यों नही बन पाए?
सन 2003 में जब राज्य में अजीत जोगी की सरकार गिर गई उसके बाद जो विधानसभा चुनाव हुआ उसमे मैं मरवाही से चुनाव लड़ा,हालांकि रणनीति अनुसार दो जगह से मुझे पार्टी टिकट देने बोली थी,वह नही हो सका,तो मरवाही से चुनाव लड़ा और इस कारण क्योंकि मुझे अजीत जोगी को घेरना था,उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री नही बनने देना था.हालांकि हुआ भी वही दोबारा मुख्यमंत्री अजीत जोगी नही बन सके.भाजपा सत्ता में आ गई. लेकिन,मुख्यमंत्री तो मुझे बनना था क्योंकि मैं नेताप्रतिपक्ष भी था और कद्दावर चेहरा भी,कहा भी गया था,परन्तु राजनीति है,कभी कभी जो होता है वह दिखता नही और जो दिखता है वह होता नही. कतिपय कारणों से मुख्यमंत्री मैं नही डॉ रमन सिंह बन गए.
तो आपने नाराजगी नही व्यक्त की या आजकल जैसा होता है बगावत या ऐसा तेवर जो पार्टी से विलग हो जाने का दबाब,नही बनाया,आलाकमान तक अपनी नाराजगी अपने प्रस्तुत नही की?
भाई साब,जब ऊपर से ही जोड़तोड़ हो तब आप अपनी तकलीफ किससे कहेंगे.हमारी छवि कद्दावर आदिवासी नेता के तौर पर थी,मैं पार्टी का अविभाजित मध्यप्रदेश का अध्यक्ष था और मुख्यमंत्री का संभावित चेहरा भी.पार्टी को चुनाव जीताने के लिए मैं अपने विधानसभा में ही नही बल्कि पूरे प्रदेश में जन सभाएं व प्रचार किया.मेरे पैर में प्लास्टर चढ़ा था फिर भी हमारे कदम नही रुके और पार्टी को जिताने के लिए पूरा दमखम लगा दिया था.कभी कभी राजनीति में अपनों के द्वारा ही खड़यंत्र का शिकार होना पड़ता है.
आप अब स्वाभिमान यात्रा निकालने जा रहे है,प्रेस कांफ्रेंस में आपने दीपावली के बाद यात्रा की शुरुवात करने की बात कही थी,तो कब से किस तारीख से शुरुवात और कहां से करेंगे,और क्या मुद्दे होंगे.?
देखिए भाई साब,हमने कहा जरूर था,और स्वाभिमान यात्रा जरूरी भी है,क्योंकि प्रदेश में मौजूदा सरकार न तो रोजगार दे पा रही है और न ही सुशासन.आये दिन राज्य में चोरी,डकैती,मारपीट,हत्याअवैध खनन, शराब खोरी तमाम तरह की अव्यवस्था हो गई है.अब छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान को जगाना जरूरी है.लेकिन हमने प्रेस कांफ्रेंस तो लिया जरूर था,पर,जो लोग हमारे साथ थे वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं,इसलिए मुझे सोचना पड़ेगा,और तय करना पड़ेगा कि यात्रा निकालें या क्या करें. प्रेस कांफ्रेंस की वह वीडियोhttps://youtu.be/HEOHpawhw8w
तो क्या पहले आपको नही पता था,आप बड़े नेता हैं,40 साल का राजनीतिक अनुभव है,और आप जिन चेहरों के साथ कांफ्रेस करने बैठे थे वे भी आपके ही पार्टी के कद्दावर नेता व राज्यमंत्री रहे हैं?
नही ऐसा नही है.दरअसल हमे इतना ही पता था कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति व विरासत को लेकर छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान को जगाने के लिए यात्रा निकाली जा रही है,जो बगैर राजनीतिक दल की होगी,और मुझे वे लोग मिले और अपना अभियान व मकसद बताया लेकिन मुझे यह नही पता था कि वे राजनीतिक यात्रा निकालेंगे.अब यह बातें समझ मे आ रही हैं कि वे किसी दल के लोग हैं जो राजनीतिक हैं इसलिए मुझे विचार करना पड़ेगा.
कहीं ऐसा तो नही की आप बीजेपी को डराने के लिए यात्रा निकालने की प्रेस कांफ्रेंस किया, वो भी तब जब 2023 में विधान सभा चुनाव होने हैं.और अब खबर देखकर पार्टी कोई समझौता कर रही हो या दबाव बना रही हो, कि पार्टी के इतर जाने से आपको नुकसान होगा?
ऐसा नही है,पर यह जरूर हो सकता है कि जब राजनीतिक दल के साथ ही यात्रा निकालनी है तो बीजेपी भी तो निकाल सकती है न.और हम तो राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी रहे हैं.आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं,हमें कौन क्या डरायेगा चमकाएगा हम जो करते हैं डंके की चोट पर करते हैं.राज्य में संपदा बहुत है,हरियाली व पर्यावरण संरक्षण की जरूरत है.हम पार्टी से अलग नही हुए हैं.
तो फिर छत्तीसगढ़ स्वाभिमान यात्रा कब निकल रही है?
इसकी जानकारी हम तभी दे सकते हैं जब उन लोगों से एक बार बैठकर बातचीत कर लेंगे,यदि बिना राजनीतिक बैनर के यात्रा निकालेंगे तो फिर समय और तारीख भी बता दी जाएगी. अन्यथा जरूरी नही है कि हम किसी राजनीतिक पार्टी के साथ अभी कोई कदम बढ़ाएं.
आप राज्य में शराब बन्दी को लेकर क्या कहेंगे,भूपेश सरकार में शराब बंदी नही हुई? होनी चाहिए या नहीं? और कब तक संभावना है?
देखिए,कांग्रेस के चुनाव एजेंडे में घोषणा पत्र में शराब बंदी करना था,वादे भी जनता से किये गए थे,लेकिन सत्ता में आने के बाद कैसा वादा और कैसा घोषणा पत्र,यह कांग्रेस पार्टी की एक चाल थी जो प्रदेश के लोगों को ठगने की थी. जहां तक मुझे लगता है,की भूपेश सरकार के कार्यकाल का एक दिन बचेगा तब हो सकता है कि चुनाव को देखते हुए शराब बंदी कर दें भूपेश बघेल.
इस बार अभी तक बीजेपी का कोई चेहरा नही दिख रहा है ,2023 में किस चेहरे पर विधानसभा लड़ेगी आपकी पार्टी, क्या आप सीएम चेहरा हो सकते हैं?
2023 का चुनाव मुद्दों पर लड़ा जाएगा,कांग्रेस सरकार विफल रही है.धान खरीदी हो,शराब बंदी हो,रोजगार व सुशासन हो सब में फेल हुई है भूपेश सरकार.राज्य में चेहरों की कमी नही है,जिसे पार्टी घोषित कर देगी वही हो जाएगा. वैसे 40 साल की राजनीतिक यात्रा में सांसद,विधायक,आयोग के अध्यक्ष,तथा अन्य महत्वपूर्ण पद बीजेपी में मुझे मिला है.आदिवासी नेतृत्व मिलना चाहिए प्रदेश को अब.
अंत मे आपका कुछ ऐसा कार्य जो जनता को याद रखना चाहिए या जनमानस में उसकी चर्चा हो सके?
कुछ विशेष नही बता सके.बाद में रुककर उन्होंने कहा कि, भाई साब,मैं चाहे जहाँ रहूं,चाहे सरगुजा रहूं या रायपुर,जो भी मेरे पास आते हैं उनकी मैं मदद करता हूँ,उनको सुनता हूँ जो बन पड़ता है उसके लिए पक्षकारिता भी करता हूँ.बड़ी बेबाकी से प्रश्नों के उत्तर देने वाले नंदकुमार साय ने कहीं न कहीं इशारों में यह भी कह दिया कि भाजपा सरकार के वे प्रथम मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ के रह सकते थे.लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच में सहज व सरल व्यक्तित्व कहीं न कहीं षड्यंत्र का शिकार हो जाता है,वही साय जी के साथ भी हुआ.खैर,अभी भी भाजपा के समर्पित राजनेता व आदिवासियों में प्रमुख आवाज हैं नंदकुमार साय.कुछ बातें न छापने की शर्त पर जो सामने आईं उससे लगता है कि नंदकुमार साय के साथ जो छल पार्टीगत हुआ है उससे आदिवासी समाज का कहीं न कहीं नुकसान हुआ और प्रदेश के कुछ तथाकथित पार्टी की धुरी समझे जाने वालों ने संभावित प्रथम आदिवासी मुख्यमंत्री के साथ प्रपंच कर आदिवासी बहुल राज्य को आदिवासी नेतृत्व से परे रखा.हालांकि साय अब राजनीति हासिये पर हैं ,70 साल से अधिक हो चुके नंदकुमार साय का व्यक्तित्व उत्तम रहा है.सरल व सहज नेता के रुप में आध्यात्मिक विषयो के पक्षधर माने जाते हैं.यहाँ यह सवाल उठना लाजमी हो जाता है,कि 15 साल छत्तीसगढ़ में भाजपा राज्य करने के बावजूद क्या वाकई कोई चेहरा पार्टी में नही है जिसके दम पर चुनाव लड़ा जा सके.यह प्रश्न आम जनता के बीच का चर्चित प्रश्न है.डॉ रमन सिंह का वह सौम्य चेहरा अब मुरझा सा गया है जिसमे लगातार 3 पंचवर्षीय पार्टी सत्ता पर काबिज रही? तो क्या पीएम मोदी ही अकेले चेहरा हैं बीजेपी के जो पूरे राज्य की राजनीति की धुरी बन गए हैं? आदिवासी बहुल प्रदेश में आदिवासी चेहरा मुख्यमंत्री के रेस से बाहर रखना कहीं न कहीं पार्टी के लिए मुश्किल न खड़ी कर दे यह चिंता भी "साय" के उत्तरों में अंतर्निहित रही है.तमाम बातचीतों से यह लगा है कि नंदकुमार साय भले ही उम्र के 60 दशक से ऊपर हो गए हैं लेकिन मुख्यमंत्री पद की रेस लगाने में अब भी रोमांचित हो उठते हैं.आदिवासी चेहरे की वकालत करने में दिलचस्पी रखते हैं श्री साय.