: ज्ञानवापी के बाद अब यूपी के एक और मस्जिद में शिवलिंग होने का दावा,लगाई गई है याचिका
Sat, Sep 3, 2022
वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर में शिवलिंग होने के दावे के बाद अब बदायूं की जामा मस्जिद में नीलकंठ महादेव मंदिर होने का दावा किया गया है. इस संबंध में बदायूं की सिविल कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसे सिविल कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है.
अखिल भारतीय हिंदू महासभा (एबीएचबी) की याचिका पर सुनवाई करते हुए एक सिविल कोर्ट ने शुक्रवार को मामला दर्ज करने का आदेश भी दिया है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया
की ख़बर के अनुसार, याचिका में दावा किया गया है कि बदायूं स्थित जामा मस्जिद परिसर वास्तविकता में एक हिंदू राजा का किला था. याचिका में दावा किया गया है कि जामा मस्जिद की मौजूदा संरचना नीलकंठ महादेव के एक प्राचीन मंदिर को ध्वस्त करके बनाई गई है.
कोर्ट ने इस संबंध में जामा मस्जिद के इंतेज़ामिया समिति, उत्तर प्रदेश सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड, उत्तर प्रदेश पुरातत्व विभाग, केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, बदायूं ज़िला मजिस्ट्रेट और राज्य के प्रमुख सचिव को भी अपना जवाब दाख़िल करने को कहा है. इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को की जाएगी. यह याचिका आठ अगस्त को दायर की गई थी.
Courtesy:BBC
: गरीबी को मुंह चिढ़ा रहे धर्म की दुकानों पर आस्था के खरीदार
Fri, Aug 19, 2022
गरीबी को मुंह चिढ़ा रहे धर्म की दुकानों पर आस्था के खरीदार
लखनऊ
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सोशल मीडिया पर एक वीडियो आया है, जिसमें एक बेटी वृंदावन में भागवत कथा सुनाने वाले एक 'फाइव स्टार' महाराज से गुहार लगाते कह रही है कि महाराज मेरे पापा और भाई का निधन हो गया है और आप कहते हैं कि मृतकों के उद्धार को भागवत कथा करानी चाहिए। किंतु मेरी मम्मी की नौकरी छूट गई है और हमारे पास इतना पैसा नहीं है कि हम कथा करा सकें। इसलिए मैं आपके यहां आई हूं, लेकिन यहां बताया गया कि सात लाख रुपए लगेंगे और पोथी बैठाने के 21 हजार रुपए...। इस पर महाराज ने बेटी से कहा कि तब यहां कथा न कराकर अपने घर में ही निकट के किसी पंडित से कथा करा लो। आप कोई भी अनुष्ठान कराओगे तो कुछ तो पैसा खर्च करना ही पड़ता है...। बेटी ने जिज्ञासावश पूछा कि क्या घर पर कथा कराने से मेरे पापा और भाई का उद्धार हो जाएगा...? महाराज ने उत्तर दिया कि हां कथा कहीं भी कराओ भागवत जी सभी का उद्धार करते हैं...।
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श्रीमद भागवत कथा का मूल श्री कृष्ण भगवान का विराट स्वरूप(फ़ाइल फ़ोटो)[/caption]इस प्रसंग ने तीन बातें उजागर कर दीं। पहली, ऐसे तमाम 'फाइव स्टार' महाराज जो भागवत कथा सुनाने की फीस लाखों रुपए में वसूल रहे हैं, क्या वह वाकई में आध्यात्मिक विचारक या संत या महात्मा या संवेदनशील मनुष्य हैं? या कि धर्म की फाइव स्टार दुकानें भर चला रहे हैं। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कि ठेले पर पांच रुपए में मिलने वाली चाय फाइव स्टार होटल में पांच सौ रुपए में मिलती है। क्या भागवत कथा भी इसी तर्ज पर बिकने वाली कोई चीज है? आस्था के नाम पर इस प्रकार की दुकानें चलाना क्या धर्म और संस्कृति की हानि नहीं है? भगवान का दर तो सभी के खुला होना चाहिए, क्या गरीब और क्या अमीर।दूसरी बात, यह भ्रान्ति किसने फैलाई है कि मृत आत्मा की शांति के लिए भागवत कथा सुनना आवश्यक है? सनातन ज्ञान तो आत्मा को शुद्ध, नित्य, अविनाशी और पूर्ण बताता है। तब इस पर जागरूकता क्यों नहीं उत्पन्न की गई, ताकि कर्मकांडों के नाम पर लोगों को यूं लूटा न जा सके?तीसरी बात, श्रद्धा, आस्था और विश्वास व्यक्ति की अपनी समझ पर आधारित तथ्य हैं। इन पर किसी अन्य का किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए और न ही इन्हें बाध्यता का विषय ही बनाया जाना चाहिए। धर्म और संस्कृति की समता व सर्वसुलभता के लिए उन धर्म गुरुओं को हतोत्साहित किया जाना आवश्यक है जो आस्था को कम-ज्यादा दामों पर बेचते हैं। बहरहाल, महाराज ने एक बात सौ फीसदी सच कही है कि भागवत कथा घर पर कराएं या खुद ही पढ़ लें, ज्ञान वही मिलेगा जो भागवत में लिखा है। तब ऐसे फाइव स्टार कथावाचकों और इन्हें सुनने वाले फाइव स्टार श्रोताओं की आलीशान आस्था को आप क्या कहेंगे? श्रद्धा या कि भोग?वृंदावन के उक्त धर्म गुरु यदि इस बेटी के दुख और दशा को समझकर उसकी निश्शुल्क सहायता कर देते तो माना जा सकता था कि वह दुकान नहीं चला रहे हैं। और यदि दुकान चलाना उनके लिए आजीविका है तब भी यदि एक दुखी बेटी की वह सहायता कर देते तो उन्हें लाखों रुपए का घाटा नहीं हो जाता वरन उनके संत होने का पुख्ता प्रमाण जनता के सामने उपस्थित होता। लेकिन वह इसमें पूरी तरह फेल हो गए। प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐसे धर्म गुरुओं की नीयत और प्रवृत्ति पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए?बीते दशक में अनेक बाबाओं की काली करतूतें सामने आने और इन्हें सलाखों के पीछे डाले जाने के बाद देश में चलने वाली धर्म की अनेक फाइव स्टार दुकानों का धंधा चौपट हो गया। आसाराम, राम रहीम, राधे मां और ऐसे कुछ और लोगों को जनता ने भगवान मान लिया था। इनकी सच्चाई उजागर होने पर ऐसा लगा कि जनता ने सबक सीख लिया होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मान लें कि जनता को अच्छे-बुरे की समझ है, लेकिन होती तो क्या आसाराम और राम रहीम उसे ठग पाते? सच यह है कि धर्म और संस्कृति की जकड़ में उलझी जनता भोली है। वह आज भी ठगे जाने को तैयार है।https://youtube.com/shorts/Z7k2TYhB3YM?feature=share(भागवत कथाओं में जुटने वाली भीड़ का प्रतीकात्मक चित्र)ठगी का यह कारोबार लुभाऊ प्रचार तंत्र की बदौलत दिन दूना और रात चौगुना हो जाता है। पहले टीवी पर होता था और आज मोबाइल पर भी हो रहा है। प्रवचन के नाम पर कुछ भी बोलो और फेसबुक पर डाल दो। भारत की भोली जनता आज भी टीवी मैनिया का शिकार है। टीवी पर संगीत मंडली की मधुर धुनों के बीच सजे-धजे बाबा का मंचन और अभिनय देख भोलीभाली जनता बाबा को सुपर स्टार की भांति सेलीब्रिटी मान बैठती है और बाबा की दुकान चल पड़ती है। याद कीजिए कि आसाराम से लेकर राम रहीम तक ने मजबूत प्रचारतंत्र के बूते ही कितनी भीड़ जुटाई। और तो और बड़े बड़े नेता, मंत्री भी इस भीड़ का लाभ उठाने के लिए इन बाबाओं के दर पर मत्था टेकने लगे। राम रहीम तो खुद को इतना बड़ा सेलीब्रिटी समझने लगा कि खुद हीरो बन अपनी फिल्में बनाने लगा। धन्य है भारत की जनता! इतना सब झेलने के बाद भी जनता ने सबक नहीं सीखा है। धर्म की दुकानें बंद नहीं हुई हैं और न भीड
: सच उजागर कर रहा'उप्र मुख्यमंत्री फेलोशिप योजना'का दूसरा पहलू
Thu, Aug 18, 2022
सच उजागर कर रहा'उप्र मुख्यमंत्री फेलोशिप योजना'का दूसरा पहलू
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सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों और योजनाओं के प्रति नागरिकों के दृष्टिकोण का पता लगाने की क्यों आई नौबत?
लखनऊ
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संजय
शेखर मिश्र
हाल ही में उत्तर प्रदेश में 'उप्र मुख्यमंत्री फेलोशिप योजना' को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुरू किया है। इस योजना को शुरू किये जाने के पीछे मुख्य कारण यह बताया गया है कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं की ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और नए विचारों का उपयोग कर पहले से चल रहे जनकल्याणकारी कार्यक्रमों को लोगों तक आसानी से पहुंचाया जा सके। साथ ही ऐसे कारकों की पहचान की जा सके जो जन योजनाओं का लाभ जरूरतमंद जनता तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं। शुरुआती चरण में सूबे के चिन्हित सौ विकासखंडों में इस योजना को लागू किया जाएगा। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी सामने आता है कि राज्य सरकार अंततः अब यह मान रही है कि वाकई सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंद लोगों तक अबाध रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। ऐसा है तो यही कहा जा सकता है कि बहुत देर कर दी हुजूर आते आते...।[caption id="attachment_2644" align="aligncenter" width="300"]
फेलोशिप योजना का विज्ञापन[/caption]बहरहाल गरीब और वंचित जनता के लिए फिलहाल यह राहत की बात हो सकती है कि योगी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में ही सही, इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार तो किया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वाकई में योगी सरकार और उप्र के सरकारी तंत्र को यह बिल्कुल नहीं पता है कि योजनाओं का शतप्रतिशत लाभ जरूरतमंद जनता तक आखिर क्यों नहीं पहुंच रहा है? यह तो बच्चा-बच्चा जानता है और इसका उत्तर तो गांव का सबसे अशिक्षित सबसे पिछड़ा व्यक्ति भी तपाक से दे देगा कि भैया संगठित भ्रष्टाचार ही इसका एकमात्र कारण है।बावजूद इसके यदि योगी सरकार को इतनी सी बात पता करने के लिए शोधार्थियों की नियुक्ति इस नई योजना के तहत गांवों में करनी पड़ रही है तो यह गले उतरने वाली बात नहीं है।
इस योजना के तहत रिसर्च स्कॉलर्स या शोधकर्ताओं को विकासखंडों में तैनात किया जाएगा, ताकि वे जनता से बात कर यह पता लगा सकें कि सरकारी योजनाओं का लाभ जनता को क्यों नहीं मिल रहा है? मिल रहा है तो कितना? साथ ही ऐसी अनेक जानकारियां जुटाकर सरकार को दे सकें जिससे कि समस्या का समाधान निकाला जा सके। उत्तर प्रदेश सरकार इनको हर महीने तीस हजार रुपये पगार देगी।
तैनात किए गए शोधार्थी को अपने विकासखंड से सभी जानकारी जुटा कर मासिक प्रगति रिपोर्ट अपने सक्षम अधिकारी को सौंपनी होगी। इसमें शोधार्थी द्वारा नीति एवं योजना के कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों और योजना के प्रति नागरिकों के दृष्टिकोण का उल्लेख किया जाएगा। त्रैमासिक प्रगति रिपोर्ट भी तैयार होगी। अंत में वार्षिक रिपोर्ट के आधार पर शोधार्थी द्वारा संपादित किए जाने वाले कामों का मूल्यांकन किया जाएगा। विचारणीय तथ्य यह है कि फेलोशिप कार्यक्रम की अवधि पूरी हो जाने के बाद सरकार इन शोधार्थियों को स्थाई सेवा या रोजगार प्रदान करने का आश्वासन नहीं दे रही है। यानी यह योजना युवाओं को स्थाई नौकरी या रोजगार देने के लिए नहीं बल्कि केवल इस बात की जानकारी जुटाने के लिए या कहें कि रिसर्च कराने के लिए है कि आख़िर उत्तर प्रदेश में जरूरतमंद जनता को सरकारी योजनाओं का लाभ सुलभ क्यों नहीं हो पा रहा है। या फिर हो भी रहा है तो उतनी तत्परता से क्यों नहीं हो रहा है। सरकारी विज्ञापन के अनुसार- इस योजना का फायदा खासकर रिसर्च या जानकारी जुटाने में होगा ताकि इसकी मदद से हम विकास को गति दे सकें। साथ ही ये युवा कई प्रकार के सुझाव भी देंगे और सरकारी योजनाओं के संचालन में आने वाली चुनौतियों का समाधान भी देंगे।
प्रयागराज जनपद में इस तरह का प्रयोग वर्ष 2016-17 में तत्कालीन डीएम संजय कुमार के नेतृत्व में स्वयंसेवी संस्था जनसुनवाई फाउंडेशन ने शुरू किया था। गांव-गांव में इसी प्रकार शोधकर्ताओं की फौज उतार कर और जनपंचायत लगाकर वंचित जनता के बीच 175 बिंदुओं पर विकास-मापी सर्वेक्षण किया जाता था और जनता उस दस्तावेज को सत्यापित करती थी।[caption id="attachment_2646" align="aligncenter" width="300"]
स्वयंसेवी संस्था जनसुनवाई फाउंडेशन द्वारा लगाई जानेवाली जनपंचायत (फ़ाइल)[/caption]उसका पंचनामा कर पंचायत की मोहर भी लगाई जाती। यह एक दस्तावेज गांव में रहने वाले वंचित वर्ग की दशा-दुर्दशा का श्वेत पत्र साबित होता। साथ ही इस बात की भी साक्ष्यांकित जानकारी प्रस्तुत करता कि इन गरीबों की दुर्दशा का दोषी कौन है। संस्था के समन्वयक एडवोकेट कमलेश मिश्रा से हमने पूछा कि आखिर तब भी समाधान क्यों नहीं निकल सका? उन्होंने बताया कि तब सपा सरकार थी और तत्कालीन डीएम संजय कुमार हमारे कार्यक्रम को लेकर उत्साहित थे, लेकिन सिस्टम की पोल-पट्टी खुलने से प्रशासनिक तंत्र असहज हो उठा। साथ ही अपनी नेतागीरी को फुस्स होता देख लोकल नेताओं ने इसे रोकने को पूरा ज़ोर लगाया। बावजूद इसके हमने संवैधानिक संस्थाओं, अदालत और आयोगों तक सच्चाई पहुंचाई, जिसका असर अब जमीन पर दिख रहा है। उप्र में अब ग्राम चौपाल योजना इसी का परिणाम है और अब यह शोध योजना भी। कमलेश मिश्रा का मानना है कि बावजूद इसके कोई समाधान नहीं निकलने वाला है क्योंकि जब नीचे से ऊपर तक पूरा तंत्र ही जानकर भी अनजान बने रहने में सिद्ध हो तो फिर क्या हो सकता है। भ्रष्टाचार के निर्मूलन के लिए वंचित और अशिक्षित समुदायों का जागरूक और सशक्त होना ही समस्या का एकमात्र समाधान है। इसके बिना कोई और उपाय नहीं है। इस वर्ग को जागरूक करने पर सर्वाधिक जोर दिया जाना चाहिए। उसे न केवल उसके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना चाहिए बल्कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी उसे जवाबदेह बनाना आवश्यक है। इसके अलावा सरकारी योजनाओं का निष्पक्ष जमीनी आडिट कराया जाना चाहिए। यह वैसा नहीं हो जैसा कि सोशल आडिट के नाम पर ड्रामा किया जा रहा है। वंचितों के हलफनामे लेकर यह प्रक्रिया दर्ज हो। दंडात्मक कार्रवाई भी आवश्यक है। वंचितों को योजनाओं का लाभ न दिला पाने वाले डीएम पर संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच होनी चाहिए और दोषियों की संपत्ति राजसात कर उन्हें सेवा से बर्खास्त किया जाना चाहिए। बिना इन सुधारों के कुछ भी नहीं बदलेगा।जब हम वंचितों से उनकी समस्या और सरकारी योजनाओं का हाल पूछते हैं तो उनका भाव कमोवेश वही निकल कर आता है जो कमलेश मिश्रा ने बताया। दरअसल पंचायती राज व्यवस्था को पूरे सरकारी तंत्र ने संगठित भ्रष्टाचार का साधन बना दिया है। प्रधान और ग्राम सचिव से लेकर प्रशासन तक एक सिस्टम विकसित कर लिया गया है कि सरकारी योजनाओं को पलीता कैसे लगाना है और मिल बांट कर गरीबों को शिकार कैसे बनाना है। यह कोई नई बात नहीं है।[caption id="attachment_2648" align="aligncenter" width="300"]
पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी का कथन[/caption]भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी खुद यह बात कह चुके थे कि एक रुपये में से दस पैसा ही गरीब तक पहुंचता है। यानी उन्हें पता था कि गड़बड़ी कहां है। लेकिन तीन दशक बाद योगी सरकार यह जानने के लिए शोधार्थियों को मैदान में उतारे तो बेतुका और अटपटा मालूम पड़ता है। शोधार्थियों से शोध कराने के बजाय न्यायिक जांच कराई जानी चाहिए और निष्पक्ष जांच टीम गांवों के वंचित समुदायों तक पहुंच कर उनके बयान दर्ज करे कि उन्होंने किस किस योजना के लिए किस किस कर्मचारी-अधिकारी को कब कब कितना पैसा दिया? आवास योजना के लिए दिया? शौचालय के लिए दिया? राशन के लिए? बीमा के लिए? पेंशन के लिए? मनरेगा के लिए? साबित करने की आवश्यकता भी नहीं है कि दिया, क्योंकि यदि गरीब आज भी योजनाओं से वंचित है तो यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि उसका हक हड़पा गया है।[caption id="attachment_2647" align="aligncenter" width="300"]
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कथन[/caption]यद्यपि मुख्यमंत्री फेलोशिप योजना देश में नई पहल नहीं है। अन्य राज्यों में भी इससे पहले यह योजना लाई जा चुकी है। उद्देश्य वही है कि शोधकर्ताओं को जनता तक पहुंचाकर जानकारी जुटाई जाए ताकि सुशासन की चुनौतियों का समाधान खोजा जा सके। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी योजनाएं समस्या का समाधान हो सकती हैं।