: दुनिया के धार्मिक संगठनों पर रोक लगाए संयुक्त राष्ट्र संघ- जल पुरुष
Thu, Jul 7, 2022
तीर्थ
और विरासत पर संकट है क्योंकि धार्मिक संगठन धर्म सिद्धांत पालना नहीं करा के विपरीत कार्य करा रहे हैं
नेशनल डेस्क-
दुनिया के धार्मिक संगठनों पर
संयुक्त राष्ट्र संघ
रोक लगवाये क्योंकि दुनिया की ‘
विरासत
‘ और ‘तीर्थ’ पर संकट है। पंचमहाभूतों से निर्मित मानवीय शरीर, उसकी आस्था, मानवता, प्रकृति की रक्षा, प्रेम, सम्मान, विश्वास, श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति भाव से ही तीर्थ बनते हैं। जब भी दुनिया ने किसी क्षेत्र, स्थान, व्यक्ति, नदी या प्रकृति के किसी अंग के प्रति मन में प्रेम, सम्मान, विश्वास, श्रद्धा, ईष्ठ और भक्ति का भाव आता है, तो वह भाव ही उसे तीर्थ बना देता है।सबसे बड़े तीर्थ तो पंचमहाभूत हैं। उनसे निर्मित जीवन है। जब तक जीवन के प्रति विश्वास और आस्था रहती है, तब हम उसे भी तीर्थ मानते हैं। यूँ तो दुनिया में ऐसे अरबों-खरबों तीर्थ होंगे, लेकिन जब हमारी आस्था कुछ विशिष्ट स्थानों में विशेष तौर से हमारी सुरक्षा भाव पैदा कर देती है, तब हम उसे अपनी धराड़ी या तीर्थ मानकर पूजने लगते हैं।
पूरी दुनिया में सबसे अधिक लोग गंगा किनारे कुंभ मे इक्क्ठे होकर इसका सम्मान करते है। अपनी भक्ति भाव मां गंगा जी को अर्पित करते है, इसलिए संख्या में दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ गंगा है। मैंने पूरी दुनिया से करोंडो-अरबों लोगों का प्यार, सम्मान, आस्था, श्रद्धा, ईष्ट और भक्ति भाव गंगा में देखा है। इसीलिए एक गंगाजल धारा के प्रति दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों की आस्था है।
गंगा प्रदूषित होने के बावजूद तीर्थ बनी हुई है। जैसे-जैसे गंगा जल की विशिष्टता नष्ट होगी वैसे ही गंगा की आस्था कम होने लगेगी। गंगा का गुण नष्ट तो गंगा का तीर्थपन भी नष्ट होता जाता है। आज भी मुख्यतः प्राकृतिक और धार्मिक तीर्थ हमारी धारणा को बदलकर, धारण करने वाली पद्धति बना देते हैं। वह जीवन पद्धति ही हमारा धर्म बनकर, हमारे धार्मिक तीर्थां का सृजन करती है। इन धार्मिक तीर्थां की शुरुआत प्राकृतिक आस्था और धर्म रक्षा के लिए होती है। दुनिया का कोई भी धर्म सर्वशक्तिमान प्रकृति के बिना नहीं बना है। हम किसी को भी अपना ईष्ट निर्माता मानकर उसे पूजते रहते हैं। यह सब पूजा पाठ जब निजी आस्था से होता है, तब वह सत्य को भगवान मानकर अहिंसा के रास्ते पर चलकर धर्म का धारक बन जाता है।
जब धर्म के नाम पर धार्मिक संगठन बन जाते हैं, तब धर्म की सहजता-सरलता-समता नष्ट हो जाती है। मानवीय जटिलताएँ, धार्मिक जटिलताओं के साथ मिलकर मानवता को मानवीय समूहों और समुदायों में बाँट देती हैं; आपस में लड़ा देती हैं। फिर वह धर्म अपने मूल चिंतन से भटक कर, अपने धार्मिक संगठन की जटिलताओं में उलझ जाता है, फिर वहाँ धर्म व तीर्थ नहीं बचता। उसके स्थान पर बड़ा भारी-भरकम आर्थिक व्यापार खडा़ हो जाता है। धर्म के नाम पर दुनिया में भयानक रूप से आपसी लडाईयां शुरू हो जाती हैं। धर्म सत्ता और राज सत्ता मिलकर, धर्मतीर्थ संवेदनाओं को नष्ट कर देती है। धर्म ‘शुभ’ पुण्यकर्म को छोड़कर उसके विपरीत लालची लाभ के रास्ते पर अनुयाईयों को चलाने लगता है।
कोविड-19 के बाद क्या इस पूरी दुनिया में अब सीख लेकर विश्व स्तर पर धार्मिक व राजनैतिक सीमा तथा जटिलताओं को जान-समझकर इनकी जटिलताओं से बचकर तीर्थ बचाओ का कोई ढाँचा, बिना किसी दलगत व धार्मिक, राजनीति के पूरी मानवता, प्रकृति की सुरक्षा और पुनर्जीवन की दिशा में कुछ पहल करने की रूपरेखा बनायी जानी चाहिए? मैं इस दुनिया के सैकड़ों हजारों लोगों को जानता हूँ, जो प्राकृतिक सत्य को ही भगवान मानते हैं, और अहिंसामय तरीके से जीते हैं। यही सभी का सहज धर्म व तीर्थ है। इससे समाज में समता, सादगी, स्वावलंबन श्रमनिष्ठ होती है। यही शोषण मुक्त करके मानवता और प्रकृति के पोषण में सभी को सच्चे काम में लगाता है। यही तीर्थ बनाने और बचाने की प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया को चलाने वालों की बातें इसमें समाहित करने का प्रयास है।
कोविड प्रकृति के साथ समाज के अधार्मिक व्यवहार से जन्मा है। जब भी समाज का अपनी विरासत या तीर्थों से प्रेम खत्म होता है। तभी अधर्म बढ़ता है। यही धर्म संगठन अधार्मिक प्रक्रिया को तेज करते हैं। धार्मिक संगठनों का इतिहास प्रमाणित करता है। धार्मिक संगठन राजसत्ता के साथ जुड़कर सत्ता पाने हेतु सभी अधार्मिक काम समाज से कराते हैं। इन कार्यों से तीर्थपन विरासत और भारतीय ज्ञानतंत्र सभी कुछ नष्ट होता रहता है। आज पूरी दुनिया में यही हो रहा है। इसे रोकना चाहिए। मानव के अपने प्राकृतिक धर्म में आपसी प्रेम सद्भावना बढ़ती है।धार्मिक संगठन सद्भावना मिटाते हैं। दुनिया के सभी धार्मिक संगठनों का चरित्र एक जैसा ही है। अतः इन पर रोक लगे। संगठन मुक्त धर्म ही चले। वही मानवता और प्रकृति का सनातन रिश्ता बनाता है। धार्मिक संगठन इंसानों के बीच गहरी खाई खोद रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ इस दिशा में पहल करे। और पूरी दुनिया के धर्म संगठनों पर रोक लगवाये। धर्म तो निजी प्रेम विश्वास, आस्था, श्रद्धा और भक्ति भाव से धर्म सिद्धांतों की पालना करता है। संगठन धर्म सिद्धांत पालना नहीं कराके विपरीत कार्य करा रहे हैं।
*लेखक जलपुरुष के नाम से विख्यात पर्यावरणविद हैं। प्रस्तुत लेख उनके निजी विचार हैं।
: रहस्य ; कृष्ण ने आखिर बांसुरी फिर क्यों नही बजाई?? आइये जानते हैं।।
Tue, Jun 28, 2022
पंडित कृष्णमूर्ति शर्मा ज्योतिषाचार्य भटगांव दुर्ग-
परा भक्ति राधा का सत्य-
वर्तमान में राधा और कृष्ण के मंदिर बहुत मिल जाएंगे। वृंदावन में राधारानी का भव्य मंदिर है। कृष्ण के नाम के साथ राधा का ही नाम जुड़ा हुआ है। अब सवाल यह उठता है कि राधा जब श्रीकृष्ण के जीवन में इतनी महत्वपूर्ण थीं तो उन्होंने राधा से विवाह क्यों नहीं किया? आखिर राधा कौन थीं
कहां हुआ था राधा का जन्म औरविवाह?
-राधा का जिक्र महाभारत में नहीं मिलता है। भागवत पुराण में भी नहीं मिलता है। राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की मित्र थीं और उनका विवाह रापाण, रायाण अथवा अयनघोष नामक व्यक्ति के साथ हुआ था।
कुछ विद्वान मानते हैं कि राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए। लेकिन अधिकतर मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था। राधारानी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा को 'लाड़ली' कहा जाता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड अध्याय ४९ श्लोक ३५, ३७, ३७, ४०, ४७ के अनुसार राधा श्रीकृष्ण की मामी थीं, क्योंकि उनका विवाह कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायाण के साथ हुआ था। ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखंड के ५वें अध्याय में श्लोक २५, २६ के अनुसार राधा को कृष्ण की पुत्री सिद्ध किया गया है।
रुक्मणि ही राधा थीं या राधा नाम की कोई महिला नहीं थी?
-कुछ विद्वान मानते हैं कि राधा नाम की कोई महिला नहीं थी। रुक्मणि ही राधा थीं। राधा और रुक्मणि दोनों ही कृष्ण से उम्र में बड़ी थीं। श्रीकृष्ण का विवाह रुक्मणि से हुआ था इसलिए समझो कि राधा से ही हुआ। मतलब यह कि राधा का कोई अलग से अस्तित्व नहीं है।
पुराणों के अनुसार देवी रुक्मणि का जन्म अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में हुआ था और श्रीकृष्ण का जन्म भी कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को हुआ था व देवी राधा, वह भी अष्टमी तिथि को अवतरित हुई थीं। राधाजी के जन्म और देवी रुक्मणि के जन्म में एक अंतर यह है कि देवी रुक्मणि का जन्म कृष्ण पक्ष में हुआ था और राधाजी का शुक्ल पक्ष में। राधाजी को नारदजी के शाप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रुक्मणि से कृष्णजी की शादी हुई। राधा और रुक्मणि यूं तो दो हैं, परंतु दोनों ही माता लक्ष्मी के ही अंश हैं।
माना जाता है कि मध्यकाल या भक्तिकाल के कवियों ने राधा-कृष्ण के वृंदावन के प्रसंग का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया। राधा-कृष्ण की भक्ति की शुरुआत निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, सखीभाव संप्रदाय आदि ने की। इसका मतलब कृष्ण की भक्ति के साथ राधा की भक्ति की शुरुआत मध्यकाल में हुई। उसके पूर्व यह प्रचलन में नहीं थी। दक्षिण के आचार्य निम्बार्कजी ने सर्वप्रथम राधा-कृष्ण की युगल उपासना का प्रचलन किया था। ऐसा भी कहा जाता है कि जयदेव ने पहली बार राधा का जिक्र किया था और उसके बाद से श्रीकृष्ण के साथ राधा का नाम जुड़ा हुआ है। इससे पहले राधा नाम का कोई जिक्र नहीं था।
राधा-कृष्ण का सांकेतिक स्थल पर मिलन और विवाह
-ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय ४८ के अनुसार और यदुवंशियों के कुलगुरु गर्ग ऋषि द्वारा लिखित गर्ग संहिता की एक कथा के अनुसार कृष्ण और राधा का विवाह बचपन में ही हो गया था। कहते हैं कि एक बार नंदबाबा श्रीकृष्ण को लेकर बाजार घूमने निकले तभी उन्होंने एक सुंदर और अलौकिक कन्या को देखा। वह कन्या कोई और नहीं राधा ही थी।
कृष्ण और राधा ने वहां एक-दूसरे को पहली बार देखा था। दोनों एक-दूसरे को देखकर मुग्ध हो गए थे। जहां पर राधा और कृष्ण पहली बार मिले थे, उसे संकेत तीर्थ कहा जाता है, जो कि संभवत: नंदगांव और बरसाने के बीच है। इस स्थान पर आज एक मंदिर है। इसे संकेत स्थान कहा जाता है। मान्यता है कि पिछले जन्म में ही दोनों ने यह तय कर लिया था कि हमें इस स्थान पर मिलना है। यहां हर साल राधा के जन्मदिन यानी राधाष्टमी से लेकर अनंत चतुर्दशी के दिन तक मेला लगता है।
गर्ग संहिता के अनुसार एक जंगल में स्वयं ब्रह्मा ने राधा और कृष्ण का गंधर्व विवाह करवाया था। श्रीकृष्ण के पिता उन्हें अकसर पास के भंडिर ग्राम में ले जाया करते थे। वहां उनकी मुलाकात राधा से होती थी। एक बार की बात है कि जब वे अपने पिता के साथ भंडिर गांव गए तो अचानक तेज रोशनी चमकी और मौसम बिगड़ने लगा, कुछ ही समय में आसपास सिर्फ और सिर्फ अंधेरा छा गया।
इस अंधेरे में एक पारलौकिक शख्सियत का अनुभव हुआ। वह राधारानी के अलावा और कोई नहीं थी। अपने बाल रूप को छोड़कर श्रीकृष्ण ने किशोर रूप धारण कर लिया और इसी जंगल में ब्रह्माजी ने विशाखा और ललिता की उपस्थिति में राधा-कृष्ण का गंधर्व विवाह करवा दिया। विवाह के बाद माहौल सामान्य हो गया तथा राधा, ब्रह्मा, विशाखा और ललिता अंतर्ध्यान हो गए।
असल में इस वास्तविक घटना को अलंकृत कर दिया गया है। राधा सचमुच ही कृष्ण से बड़ी थीं और सामाजिक दबावों के चलते यह संभव नहीं था कि उम्र में कहीं बड़ी लड़की से विवाह किया जाए। लेकिन यदि दोनों के बीच प्रेम रहा होगा तो निश्चित ही गुपचुप रूप से गंधर्व विवाह किया गया हो और इस बात को छुपाए रखा हो?
कृष्ण ने नहीं निभाया वादा
-एक अन्य कथा के अनुसार राधा और कृष्ण एक-दूसरे को प्रेम करने लगे थे। उस वक्त कृष्ण की उम्र ८और राधा की १२ वर्ष थी। जब यह बात राधा के घर के लोगों को पता चली तो उन्होंने उसे घर में ही कैद कर दिया। ऐसा किए जाने के कई कारण थे। एक कारण यह था कि राधा की मंगनी हो गई थी।
जब कृष्ण को यह पता चला तो वे उसे कैद से छुड़ाकर यशोदा मां के पास ले आए। यह देखकर यशोदा मां भी दंग रह गईं। तब उन्होंने कृष्ण को बहुत समझाया कि लल्ला, ऐसा करना ठीक नहीं है। मैं तेरा विवाह दूसरे से करा दूंगी, लेकिन कृष्ण नहीं माने।
बाद में यशोदा मैया और नंदबाबा उन्हें लेकर ऋषि गर्ग के पास गए। तब गर्ग ऋषि ने कान्हा को समझाया कि उनका जन्म किसी महान उद्देश्य के लिए हुआ है अत: वे किसी भी मोह में बंध नहीं सकते। यह व्यर्थ का हठ छोड़ दें। यह सुनकर कान्हा उदास हो गए और उस दौरान उनका बुलावा मथुरा के लिए आ गया। तब वे वृंदावन छोड़कर हमेशा के लिए मथुरा चले गए। कृष्ण जाते वक्त राधा से ये वादा करके गए थे कि वो वापस आएंगे, लेकिन कृष्ण कभी भी राधा के पास वापस नहीं आए और यही दर्द हमेशा राधा और कृष्ण के मन में रहा।
वृंदावन की गलियों में हैं प्रेम के निशान
-राधा का गांव बरसाना था। कान्हा पहले गोकुल, फिर नंदगांव और बाद में वृंदावन में रहने लगे थे। वृंदावन में ही राधा के परिवार के लोग भी रहने आ गए थे। बस वहीं पर सांकेतिक तीर्थ से जन्मा राधा और कृष्ण का प्रेम पनपा। कहते हैं कि बचपन की मुहब्बत भुलाए नहीं भुलती।
उस काल में होली के दिन यहां वृंदावन में इतनी धूम होती थी कि दोनों गांव बरसाना और नंदगांव के लोग वृंदावन में इकट्ठा हो जाते थे। बरसाने से नंदगाव टोली आती और नंदगांव से भी टोली जाती थी। बरसाना गांव के पास २ पहाड़ियां मिलती हैं। उनकी घाटी बहुत ही कम चौड़ी है। मान्यता है कि गोपियां इसी मार्ग से दही-मक्खन बेचने जाया करती थीं। यहीं पर कभी-कभी कृष्ण उनकी मक्खन वाली मटकी छीन लिया करते या फोड़ दिया करते थे।
विष्णु पुराण में वृंदावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि यहीं पर श्रीकृष्ण और राधा एक घाट पर युगल स्नान करते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और गोपियां आंख-मिचौनी का खेल खेलते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और उनके सभी सखा और सखियां मिलकर रासलीला अर्थात तीज-त्योहारों पर नृत्य-उत्सव का आयोजन करते थे। कृष्ण की शरारतों के कारण उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है। यहां पर यमुना घाट के प्रत्येक घाट से भगवान कृष्ण की कथा जुड़ी हुई है।
कृष्ण ने जो नंदगांव और वृंदावन में छोटा-सा समय गुजारा था, उसको लेकर भक्तिकाल के कवियों ने कई कविताएं लिखी हैं।
वृंदावन छोड़कर कृष्ण जब मथुरा में कंस को मारने गए, तब उनका जीवन पूरी तरह से बदल गया। कंस को मारने के बाद उनके जीवन में उथल-पुथल शुरू हो गई।
नारद के श्राप के कारण राधा और कृष्ण को विरह सहना पड़ा-
रामचरित मानस के बालकांड के अनुसार एक बार विष्णुजी ने नारदजी के साथ छल किया था। उन्हें खुद का स्वरूप देने के बजाय वानर का स्वरूप दे दिया था। इस कारण वे लक्ष्मीजी के स्वयंवर में हंसी का पात्र बन गए और उनके मन में लक्ष्मीजी से विवाह करने की अभिलाषा दबी-की-दबी ही रह गई थी।
नारदजी को जब इस छल का पता चला तो वे क्रोधित होकर वैकुंठ पहुंचे और भगवान को बहुत भला-बुरा कहा और उन्हें 'पत्नी का वियोग सहना होगा', यह श्राप दिया। नारदजी के इस श्राप की वजह से रामावतार में भगवान रामचन्द्रजी को सीता का वियोग सहना पड़ा था और कृष्णावतार में देवी राधा का।
राधा और कृष्ण का पुनर्मिलन-
जब कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा चले गए, तब राधा के लिए उन्हें देखना और उनसे मिलना और दुर्लभ हो गया। कहते हैं कि राधा और कृष्ण दोनों का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में बताया जाता है, जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृंदावन से नंद के साथ राधा आई थीं।
राधा सिर्फ कृष्ण को देखने और उनसे मिलने ही नंद के साथ गई थीं। इसका जिक्र पुराणों में मिलता है। कहा जाता है कि जब द्वापर युग में नारायण ने श्रीकृष्ण का जन्म लिया था, तब मां लक्ष्मी ने राधारानी के रूप में जन्म लिया था ताकि मृत्युलोक में भी वे उनके साथ ही रहें, लेकिन ऐसा हो नहीं सका।
राधा और कृष्ण के प्रेम की मार्मिक कहानी-
राधा और कृष्ण के बीच पहले सांकेत स्थल और फिर बाद में वृंदावन में होती रही मुलाकात के कारण प्रेम जन्म लेने लगा था। बचपन का प्यार बहुत गहरा और निष्काम होता है। श्रीकृष्ण उस वक्त ८ साल के और राधा १२ साल की थीं। कहते हैं कि उस वक्त श्रीकृष्ण को २ ही चीजें सबसे ज्यादा प्रिय थीं- बांसुरी और राधा। कृष्ण की बांसुरी की धुन सुनकर राधा के जैसे प्राण ही निकल जाते थे। कई जन्मों की स्मृतियों को कुरेदने का प्रयास होता था और वह श्रीकृष्ण की तरफ खिंची चली आती थी।
भगवान श्रीकृष्ण से राधा पहली बार तब अलग हुई, जब श्रीकृष्ण वृंदावन छोड़कर बलराम के साथ कंस के निमंत्रण पर मथुरा जा रहे थे। तब उन्हें भी नहीं मालूम था कि उनका जीवन बदलने का वाला है। यह प्रेमपूर्ण जीवन अब युद्ध की ओर जाने वाला है। पूरा वृंदावन उस वक्त रोया था। राधा के लिए तो जैसे सबकुछ खत्म होने जैसा था। राधा के आंसु सूखकर जम गए थे। बस, श्रीकृष्ण राधा से उस वक्त इतना ही कह पाए कि 'मैं वापस लौटूंगा।'
लेकिन श्रीकृष्ण कभी नहीं लौटे और मथुरा में वे एक लंबे संघर्ष में उलझ गए। बाद में उन्होंने रुक्मणि से विवाह कर लिया और द्वारिका में अपनी एक अलग जिंदगी बसा ली। जब कृष्ण वृंदावन से निकल गए तब राधा की जिंदगी ने एक अलग ही मोड़ ले लिया था। राधा का विवाह हो गया, लेकिन राधा श्रीकृष्ण के विरह में जीती और मरती रहीं। राधा ने अपना दांपत्य जीवन ईमानदारी से निभाया और जब वे बूढ़ी हो गईं तो उसके मन में मरने से पहले एक बार श्रीकृष्ण को देखने की आस जगी।
सारे कर्तव्यों से मुक्त होने के बाद राधा आखिरी बार अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने गईं।
जब वे द्वारका पहुंचीं तो उन्होंने कृष्ण के महल और उनकी ८ पत्नियों को देखा, लेकिन वे दुखी नहीं हुईं। जब कृष्ण ने राधा को देखा तो वे बहुत प्रसन्न हुए। कहते हैं कि दोनों संकेतों की भाषा में एक-दूसरे से काफी देर तक बातें करते रहे। तब राधा के अनुरोध पर कृष्ण ने उन्हें महल में एक देविका के पद पर नियुक्त कर दिया।
कहते हैं कि वहीं पर राधा महल से जुड़े कार्य देखती थीं और मौका मिलते ही वे कृष्ण के दर्शन कर लेती थीं। एक दिन उदास होकर राधा ने महल से दूर जाना तय किया। उन्होंने सोचा कि वे दूर जाकर दोबारा श्रीकृष्ण के साथ गहरा आत्मीय संबंध स्थापित करेंगी। हालांकि श्रीकृष्ण तो अंतरयामी थे और वे राधा के मन की बात जानते थे।
कहते हैं कि राधा एक जंगल के गांव में में रहने लगीं। धीरे-धीरे समय बीता और राधा बिलकुल अकेली और कमजोर हो गईं। उस वक्त उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की याद सताने लगी। आखिरी समय में भगवान श्रीकृष्ण उनके सामने आ गए। भगवान श्रीकृष्ण ने राधा से कहा कि वे उनसे कुछ मांग लें, लेकिन राधा ने मना कर दिया। कृष्ण के दोबारा अनुरोध करने पर राधा ने कहा कि वे आखिरी बार उन्हें बांसुरी बजाते देखना और सुनना चाहती हैं। श्रीकृष्ण ने बांसुरी ली और बेहद सुरीली धुन में बजाने लगे।
श्रीकृष्ण ने दिन-रात बांसुरी बजाई
। बांसुरी की धुन सुनते-सुनते एक दिन राधा ने अपने शरीर का त्याग कर दिया। कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपनी प्रेमिका की मृत्यु बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने बांसुरी तोड़कर झाड़ी में फेंक दी। उसके बाद से श्रीकृष्ण ने जीवन में कभी बांसुरी नहीं बजाई।
: आस्था संस्कृति और हमारी विरासत है शिवनाथ .
Wed, Jun 15, 2022
दुर्ग भिलाई- समन्वय सहयोग और संवाद को आधार मानकर नदी संरक्षण के लक्ष्य को पूरा करने दुर्ग शिवनाथ बचाओ अभियान की गतिशीलता बनी हुई है। शिवनाथ नदी दुर्ग जिले की जीवनधारा है।
इसी जीवनधारा को सहेजने प्रतिमाह की पूर्णिमा को शिवनाथ नदी की आरती की जाती है। लोगों को नदी के प्रति आस्था से जोड़ने का यह एक प्रयास है जो शिवनाथ बचाओ अभियान के तहत एक संस्था कर रही है। जनसुनवाई फाउंडेशन नामक सामाजिक संस्था ने शिवनाथ सेवा मंडल का गठन कर इस अभियान को सफल बनाने के लिए दुर्ग भिलाई के लोगों को नदी संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी समझने व निभाने के लिए जोड़ने का कार्य कर रही है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर हुई श्रेष्ठ शिवनाथ आरती -
दुर्ग महमरा एनीकट तट पर मंगलवार को ज्येष्ठ पूर्णिमा के उपलक्ष्य में नदी की आरती की गई। जिसमें कुछ श्रेष्ठजनों ने अपनी आस्था का दीप जलाकर शिवनाथ की आरती की। नदी को प्रदूषण मुक्त करने का संकल्पित लौ प्रज्वलित करते हुए भाजपा के जिला महामंत्री शंकरलाल देवांगन ने अपने जन्मदिन के मौके पर नदी की प्रथम आरती की एवं पूजापाठ कर नदी तट पर पौधरोपण करने का संकल्प लिया।
श्री कृष्ण भगवान का बाल चित्र देकर लोगों ने जन्मदिन की बधाई देवांगन जी को दिया। शिवनाथ आरती का अनवरत प्रबन्ध करने वाले वरिष्ठ समाजिक चिंतक शिक्षाविद व मंडल के संरक्षक बृजमोहन उपाध्याय ने उक्त अवसर को यादगार बनाते हुए सपत्नीक आरती पूजन कर नदी की आरती उतारी। इस मौके पर बृजमोहन उपाध्याय ने कहा कि नदियां हमारी आस्था हैं। नदी को संपूर्णता में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैसे हमारे शरीर मे रक्त प्रवाह होता है वैसे ही नदी के शरीर मे जल-प्रवाह,लेकिन जैसे हम रक्त प्रवाह को पूरा शरीर नही मान लेते वैसे ही हमे जल प्रवाह को नदी नही मान लेना चाहिए। हमे शिवनाथ नदी के स्वभाव ,प्रकृति,जीवन प्रक्रिया उसके वैशिष्ट को गहराई से समझना होगा और नदी के रखरखाव,साफ सफाई,नदी किनारे वृक्षारोपण के कार्यक्रम को अनवरत करना चाहिए। आरती के पश्चात खीर का प्रसाद वितरण किया गया। इस दौरान प्रमुखरूप से शंकरलाल देवांगन, अनिता उपाध्याय, दिनेश मिश्र सपत्नीक, बृजमोहन उपाध्याय, शिवाजी सिंह,संजय मिश्रा, सरोज देवी,अर्पण भुवाल, विनीत साहू, सरला चंद्राकर,मीणा साहू,विक्रम सिंह सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
शिवनाथ का प्रदूषण जनमानस को पड़ेगा भारी
शिवनाथ नदी के तट पर बसा दुर्ग और सटा हुआ भिलाई शहर इसी नदी की बदौलत फल फूल रहा है। इसी शिवनाथ का जल पीकर लोग जीवित हैं लेकिन अब बाजारीकरण व आधुनिकता की चौड़ाई में नदी के प्रति आस्था व जिम्मेदारी सिकुड़ती जा रही है। शहर का नाला व कचरा नदी की गोद मे समा रहा है। जिससे नदी की अस्मिता व जैविक तंत्र पर बुरा असर पड़ रहा है। लोग नदी में ही अपनी आस्था का अवशेष व घर का कचरा दोनों डाल रहे हैं। औद्योगिकीकरण ने तो नदी के पाटों को पाट कर सीमित करने का लक्ष्य बना लिया है। प्रशासन मौन स्वीकृति के साथ तमाशबीन बना हुआ अपनी लाचारी का रोना रोते हुए जिम्मेदारी से मुक्ति पाने की ही फिराक में रहता है। निगम ने शिवनाथ नदी तट पर कचरा फेकने पर जुर्माना लगाए जाने की बात लिखा कर अपना फर्ज पूरा होना समझ लिया है। लोगों में कोई नैतिकता लगता है बची ही नही है।धुआंधार गन्दगी नदी में ही डाली जा रही है। बढ़ता प्रदूषण ही चिंता का कारण है। नदी को इससे बचाना होगा। अन्यथा
बगैर शिवनाथ जीवन बचाना मुश्किल हो जाएगा,जब जल व जल की श्रोत नदी ही नही प्रवाहमान रहेगी तो जीवन कहाँ से गतिमान रहेगा। इसलिए जनमानस को अब चेतना होगा। शिवनाथ बचाओ अभियान के संयोजक संजय मिश्र ने सभी लोगों का अभिनंदन करते हुए अधिक से अधिक संख्या में लोगों को शिवनाथ बचाओ अभियान में जुड़ने की अपील की है। ताकि अपनी सदानीरा जीवनदायिनी को बचाया जा सके।
जनजागरूकता से ही बदलाव संभव -
हालांकि शिवनाथ की इस दुर्दशा को देखकर शहर के कुछ लोग आगे आकर लोगों में जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। शिवनाथ सेवा मंडल का गठन कर स्वयंसेवी संस्था जनसुनवाई फाउंडेशन ने शिवनाथ बचाओ आंदोलन की शुरुवात दो वर्ष पहले से ही कर दी है। विभिन्न आयामो व कार्यक्रमो के साथ इस अभियान को गति दी जा रही है। शिवनाथ महोत्सव की शुरुवात भी शिवनाथ सेवा मंडल ने की और भारत के जल पुरुष डॉ राजेन्द्र सिंह को भी शिवनाथ तट पर लाकर जल सम्मेलन कराया। लोगों को आस्था से जोड़ने हर माह की पूर्णिमा को सायंकाल मे शिवनाथ नदी की शिवगंगा आरती भी दुर्ग तट पर की जाने लगी जिससे लोग जुड़ते गए । विभिन्न आयोजनों के माध्यम से शिवनाथ बचाओ अभियान तेजी से चर्चा में आ गया जनप्रतिनिधियों व शासन को पत्र लिखकर जिम्मेदार संस्था ने अपनी जिम्मेदारी भी निभाई लेकिन वादें हैं वादों का क्या। शासन प्रशासन वादा एवं आस्वासन को चने मुर्रे की भांति रोज खाता और डकारता है। अब जो कुछ हो सकता है वो सिर्फ जनजागरूकता के साथ ही हो सकेगा। स्वच्छता के साथ ही साथ प्रशासन का डंडा भी गन्दगी करने वालों पर चलना लाजमी है। इस ओर जिला प्रशासन व निगम प्रशासन को निहारना पड़ेगा और कठोर कार्रवाई करना पड़ेगा तभी शिवनाथ के अस्तित्व रक्षा की कुछ बात बनेगी। युवाओं का जुड़ना इस अभियान की सार्थकता होगी अतएव दुर्ग भिलाई व क्षेत्रीय जनमानस के जुड़ाव हेतु अपील की जा रही है।