छत्तीसगढ़

कहो तो कह दूं, खोखले दावों की खुलती पोल… सन्देश अधूरा तो परिणाम कहाँ से पूरा..आइये जाने सच!!

कई राज्यों ने पहले से ही कागजों में प्रतिबंधित किया है पॉलीथिन,तो हर साल नया क्या??

कहो तो कह दूंः
संदेश अधूरा तो परिणाम कहां से पूरा आएगा?
पॉलीथीन, प्लास्टिक पर प्रतिबंध फिर मजाक न बन जाए!
 पर्यावरण की सोच – 1 जुलाई से केंद्र सरकार ने घातक प्रदूषण कारक सिंगल यूज प्लास्टिक एवं कैरीबेग्स पर प्रतिबंध लगा दिया है जो कि पहले से ही कई राज्यों में लगा हुआ है। दरअसल हमारी सरकारें पर्यावरणीय समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रही सिर्फ औपचारिकता निभा रही है। आधे अधूरे प्रतिबंधों के चलते जनता में भी इन प्रतिबंधों का मजाक बन रहा है।

हर जगह सिंगल यूज एंण्ड थ्रो की सामग्रियां घडल्ले से इस्तेमाल हो रहीं है,प्रतिबंध का राई बराबर भी असर नहीं -दिख रहा। सरकार का पर्यावरण विभाग ही इन घातक सिंगल यूज प्लास्टिक वस्तुओं के निर्माण पर अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करता है। डेयरी जैसी सरकारी संस्थाऐं खुद थैली में दूध आपूर्ति कर रहीं है। रहा सवाल प्रतिबंधों की पालना का तो, न तो सरकारी अधिकारियों के पास इच्छा शक्ति है और न ही पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ व संसाधान। सरकार जनता से उम्मीद करती है कि वो जागरूक हो कर बंद कर देगी तो ये ख्याली पुलाव है। जनता अपनी सुविधाओं को बिना भय या कड़ाई के छोड नहीं सकती ये जनता का स्वभाव है,इसकी जड़े शिक्षा व संस्कारों में ही खोजनी पड़ेगी। धार्मिक और आघ्यात्मिक संस्थाऐं भी यहां पर फेल है। अब बात जिम्मेदार लोगों की तो वो सरकारों में बैठे है और किसी प्रकार का पंगा लेने में उनकी रूचि नहीं होती। अधिकारी वर्ग सीधा इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व और आम जनता को दोषी बता कर बहुत ही चालाकी से समस्याओं को घुमा देते है। जनता व नेता अधिकारियों को निकम्मा लापरवाह बता कर समस्याओं से मुंह फेर लेते है। राजनीतिक नेतृत्व को वोटों के बिगड़ने का खतरा दिखता है तो वो चाहे अनचाहे प्रतिबंधों के कानूनों में ढील दे देते है। जबकि वे व्यवस्थाओं को सही कर भी वोट बैंक में ईजाफा कर सकते है।
समस्या जस की तस बनी रहती है। इसी का परिणाम है कि शहरों में नालियों से बाढ़ आ जाती है, सड़कें बार बार टूट जातीं है, नदियां मेला ढोने वाली रेल गाड़ी बन जातीं है,वायुमण्डल प्रदूषित होता रहता है। तालाब और पोखर मच्छर प्रजनन केंद्र बन जाते है। डंपिंग यार्डों में कचरे के पहाड़ खडे हो गए हैं जो गर्मियों में सुलगते रहते है, और बरसात में सड़ते रहते है। इसका समाधान तो कचरे के प्रथक्कीकरण और प्लास्टिक रिसाईक्लिंग सिस्टम को कबाड़ी तंत्र से मजबूत बनाने से ही होगा। पर्यावरणविद बृजेश विजयवर्गीय जी बताते हैं कि कोटा एनवायरमेंटल सेनीटेशन सोसायटी – केईएसएस ने पिछले सालों नगर निगम के साथ वेज्ञानिक पद्धति ठोस, तरल, संसाधन प्रबंधन (एसएलआरम) पर थोड़ा काम भी किया,स्टाफ को भी प्रशिक्षित किया,सारा प्रशिक्षण बेकार हो गया जिस पर लाखों रूपए खर्च हुए थे। लेकिन सरकारों की इच्छा शक्ति के अभाव में अधूरा छूट गया। महाराष्ट्र के पुणे और छत्तीसगढ़ के अंंिबकापुर, मघ्यप्रदेश के इंदौर तथा उज्जैन में श्रेष्ठ उदाहरण पेश किए गए थे। परंतु अब कोई न तो उदाहरण है और न ही कोई योजना। है तो सिर्फ कागजों में पीठ थपथपाने की आवाज,जो दुखद व चिंतनीय है। (पर्यावरणविद बृजेश जी साभार)..

Khabar Times
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